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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 210

सप्तम लम्बक १८१
उसके बहुत मनाने पर भी अलंघनीय दैव-गति के कारण ईर्ष्या से मोहित होकर
मैंने सोचा कि आश्चर्य है कि यह मुझे कुछ न समझकर दूसरी स्त्री का सेवन करता है—
यह सारा घमण्ड इसे इस खड्ग के कारण है, इसलिए इस खड्ग को ही छिपा देती हूँ ऐसा
सोचकर मूर्खता के कारण मैंने रात में उसके सो जाने पर तलवार को आग में फेंक दिया
॥१६१-१६३॥
इस कारण यह खड्ग भी कलंकित (काला) हो गया और यह इस दशा (बेहोशी) को
प्राप्त हो गया ॥१६४॥
तदनन्तर प्रेम से बंधी यह और मैं—दोनों मरने का प्रयत्न कर रही थीं कि तुम
आ गये ॥१६५॥
सो अब तुम ऐसे नृशंस-कर्म करनेवाली और अपनी जाति के धर्म को न छोड़नेवाली
मुझे इसी तलवार से काट दो। इस प्रकार, भौजाई के कहने पर अनिच्छासेन ने सोचा कि यह तो
शोक और सन्ताप के कारण ऐसा कह रही है इसे न मारना चाहिए। मैं ही भाई के शोक में
आत्महत्या क्यों न कर लूं ? ऐसा सोचकर उसने अपना गला काटना चाहा ॥१६६ १६७॥
हे राजकुमार ! ऐसा न करो यह तुम्हारा भाई मरा नहीं है। देवी के खड्ग का अपमान
होने के कारण उसी के कोप से यह बेहोश हो गया है ॥१६८॥
इस विषय में यमदंष्ट्रा को भी अपराधिनी न समझो। क्योंकि यह सब शाप के
कारण लोगों का हस्तकौशल है। ये दोनों ही तुम्हारे भाई की पहले जन्म की पत्नियां हैं।
इसलिए अपनी इच्छा-सिद्धि के लिए उसी भगवती विन्ध्यवासिनी की आराधना
करो ॥१६९ १७० ॥
इस प्रकार, आकाशवाणी सुनकर अनिच्छासेन ने मरने का प्रयत्न रोक लिया। विमान
पर चढ़कर और उस काले खड्ग को लेकर वह विन्ध्यवासिनी के चरणों की शरण में
गया ॥१७१ १७२॥
यहाँ जाकर देवी को अपने शिर का बलिदान देने के लिए उद्यत हुए उसने आकाशवाणी
सुनी कि 'बेटा ! साहस न करो। जाओ। तुम्हारा भाई जीवित हो जाये और खड्ग भी
निर्मल हो जाये। मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ।' ॥१७३ १७४ ॥
ऐसी दिव्य वाणी सुनकर हाथ में लिये खड्ग को निष्कलंक (चमचमाता) देखकर देवी
को प्रणाम किया तथा उसकी प्रदक्षिणा की ॥१७५॥