कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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राजा भी उनकी उत्पत्ति से सफलमनोरथ होकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने महान्
उत्सव किया ॥७१॥
राजा ने उन दोनों में से कमल के समान नेत्रवाले तथा अद्भुत आकृतिवाले बड़े पुत्र का
नाम इन्दीवरसेन रखा ॥७२॥
और, दूसरे छोटे पुत्र का नाम अनिच्छासे न रखा क्योंकि उसके लिए उसकी माता ने
राजा की इच्छा के विरुद्ध फल खा लिया था ॥७३॥
तदनन्तर राजा की दूसरी रानी काव्यालङ्कारा यह देखकर क्रोध से भरी हुई सोचने
लगी—॥७४॥
ओह ! मेरी इस सौत ने मुझे पुत्र-प्राप्ति से वंचित कर दिया है। इसलिए, इस क्रोध
का बदला मुझे अवश्य लेना चाहिए ॥७५॥
अपनी युक्ति से इसके दोनो लड़कों का विनाश करना चाहिए। ऐसा सोचकर वह
अवसर की प्रतीक्षा में उपाय सोचती हुई चुप बैठी रही ॥७६॥
जैसे-जैसे राजा के वे दोनो बालक बढ़ते गए, वैसे ही वैसे उसका क्रोध-रूपी वृक्ष भी
बढ़ता रहा ॥७७॥
क्रमशः यौवन अवस्था में आये हुए बलशाली वे दोनों राजकुमार, दिग्विजय की इच्छा से
अपने पिता के पास आकर बोले—॥७८॥
महाराज ! हम लोग अस्त्र-शस्त्र विद्या में शिक्षित हो गये और युवावस्था में प्राप्त हो
गये तो हम इन निष्फल भुजाओं को लेकर व्यर्थ क्यों बैठें ? विजय की इच्छा न रखनेवाले
क्षत्रिय की भुजाओं को और उनके यौवन को धिक्कार है । इसलिए, पिताजी ! हम दोनों
को दिग्विजय-यात्रा के लिए आज्ञा प्रदान करें ॥७९-८०॥
कुमारों की बातों को सुनकर राजा प्रसन्न हुआ उसे स्वीकार किया और उनकी
दिग्विजय-यात्रा की तैयारी की और उनसे कहा कि 'तुम्हें जब कभी संकट का सामना करना
पड़े तब कष्टहारिणी माता अम्बिका का स्मरण करना। तुम दोनों उसी अम्बिका के दिये
हुए हो' ॥८१-८२॥
ऐसा कहकर राजा ने सेना सामन्त आदि के साथ उन दोनो को विजय-यात्रा
के लिए भेज दिया। अपने वृद्ध प्रधान मन्त्री और उन कुमारो के मामा प्रथममयस को भी
परामर्श आदि देने के लिए साथ भेज दिया। उनकी माता ने प्रस्थान के समय मंगलाचरण
किया ॥८३-८४॥
उन दोनों बलवान् भाइयों ने पहले पूर्व दिशा में जाकर दिग्विजय किया ॥८५॥
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