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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ७
इस प्रकार, बहुत दिन व्यतीत होने पर भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार उसे इस
बात पर गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हो गई ॥२७॥
उसे अत्यन्त चिन्तित देखकर रानी अलंकारप्रभा ने उसकी उदासी का कारण
पूछा ॥२८॥
प्रश्न सुनकर राजा ने कहा— 'देवि ! मुझे सभी प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त है, किन्तु
एक पुत्र का अभाव मेरी चिन्ता का कारण हो रहा है ॥२९॥
मैंने एक पुत्रहीन सत्त्ववान् मनुष्य की कथा सुनी थी उसके स्मरण आने पर आज
चिन्ता बढ़ गई है' ॥३०॥
'वह कैसी कथा है ?' — इस प्रकार रानी के पूछने पर राजा ने संक्षेप से वह कथा इस
प्रकार सुनाई ॥३१॥
राजा सत्त्वशील की कथा
चित्रकूट नामक नगर में ब्राह्मणों की सेवा में निरत ब्राह्मणवर नामक यथार्थ नामवाला
राजा था ॥३२॥
उसका सत्त्वशील नामक एक विजयी और युद्ध में सहायता करनेवाला भक्त सेवक था।
उसे राजा प्रतिमास एक सौ स्वर्ण-मुद्रा वेतन के रूप में देता था ॥३३॥
किन्तु परम उदार उस सत्त्वशील के लिए इतना धन पूरा नहीं होता था क्योंकि पुत्र न
होने के कारण वह उस धन को दान कर देता था ॥३४॥
वह सोचता था कि विधि ने मेरे मनोरञ्जन के लिए एक पुत्र नहीं दिया केवल दान
देने का व्यसन दिया वह भी धन के बिना ॥३५॥
संसार में पुराने और सूखे वृक्ष या पत्थर का जन्म होना अच्छा है किन्तु दान का
व्यसनी होकर दरिद्र होना अच्छा नहीं ॥३६॥
ऐसा सोचते हुए सत्त्वशील ने घूमते-घामते दैवयोग से अपने उद्यान में कोष (खजाना)
प्राप्त किया ॥३७॥
अपने नौकरों की सहायता से वह सत्त्वशील अपरिमित स्वर्ण और रत्नों से भरे हुए खजाने
को अपने घर उठवा ले गया ॥३८॥
इतना धन प्राप्त करके वह सुख-भोग करता दान देता और भृत्यों तथा मित्रों को
बाँटता हुआ सुख से रहने लगा ॥३९॥