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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये मर्कटकांस
के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया
था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी
नहीं करना चाहिए ॥१७-१८॥
पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में
प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१ ९॥
उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तपनचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की
सेवा में तत्पर होगया ॥११ ॥
उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन मान आदि देकर अनुगृहीत
किया ॥१११॥
और, स्वयं मित्रों एव रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य
करने लगा ॥११२॥
इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा 'स्वामी ! इसी प्रकार इस
लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपन-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है।
मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप
हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥
इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ
तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥
स्नान करके पिता और माता की आँखों मे अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने
पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरितसागर के रत्नप्रभालम्बक का
षष्ठ तरंग समाप्त
सप्तम तरंग
नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)
तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मणिवेश्म मे विविध बातें करते हुए नरवाहन-
दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१ २॥