Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 164 of 1079

Read in context
Page 164

सप्तम लम्बक १४१
'हे भले आदमी ! तू हमारा हितैषी है और कुशल वैद्य है इसलिए पूछता हूँ कि
क्या कोई ऐसी युक्ति भी है कि बुढ़ापे को रोका जा सके' ॥४७॥
यह सुनकर केवल कलावाजी जाननेवाला एवं यथार्थ नामवाला वह कुटिल तरुणचन्द्र
सोचने लगा ॥४८॥
'यह राजा मूर्ख है और मेरा भोज्य भी। धीरे-धीरे समझूँगा' ऐसा सोचकर राजा
से बोला—॥४९॥
'महाराज ! यदि तुम भूमि के नीचे (तहखाने) में आठ महीनों तक रहकर मेरी
औषधि खाओ तो मैं तुम्हारा बुढ़ापा दूर कर दूँ' ॥५०॥
ऐसा सुनते ही राजा ने तुरन्त भू-गृह [तहखाना] बनवाया। विषय-लम्पट मूर्ख विचार
करने की शक्ति नहीं रखते ॥५१॥
हे राजन् ! पूर्वजों के तप दम और युग के प्रभाव से बड़े-बड़े रसायन सिद्ध हो चुके हैं।
किन्तु, आजकल समय के प्रभाव से उनका नाम ही रह गया है। बल्कि ये विपरीत फल
देते हैं॥५२-५३॥
अतः यह उचित नहीं है। धूर्त वैद्य मूर्खों के साथ ठगी करते हैं। महाराज ! क्या गई अवस्था
फिर लौटकर आती है? ॥५४॥
इस प्रकार मन्त्रियों की बातें राजा के हृदय में पैठ न सकीं, क्योंकि राजा का हृदय भोग
की प्रबल तृष्णा से भरा हुआ था ॥५५॥
अतः वह राजा वैद्य के वचन पर विश्वास करके और राजसी ठाट-बाट छोड़ भू-गृह में
अकेला घुसा ॥५६॥
अपने एक भृत्य के साथ वैद्य उस राजा की औषधि आदि से परिचर्या करने लगा। राजा
उस अन्धकारमय भू-गृह में इस प्रकार रहने लगा मानों उसका अत्यन्त बढ़ा हुआ अज्ञान हृदय से
बाहर निकल पड़ा हो ॥५७-५८॥
इस प्रकार, छह महीने बीतने पर और राजा की वृद्धावस्था को वही देखकर वह दुष्ट वैद्य
राजा से मिलती-जुलती आकृतिवाले एक पुरुष को लाया और उस युवा से बोला कि 'मैं तुम्हें
राजा बनाता हूँ। उससे इस प्रकार सम्मति करके उसने दूर से ही भूगृह तक एक लम्बी सुरंग
बनवाई और उसके द्वारा भू-गृह में जाकर राजा को मार डाला और रात को अंधेरे कुएँ में उसकी
काया फेंक दी ॥५९—६१॥