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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १२७
वह रूपशिखा इस प्रकार पिता को ठगकर और पति को लेकर चली गई। पतिव्रता
स्त्रियाँ पति के हित को छोड़कर और कुछ नहीं जानतीं ॥१९४॥
तब शृंगभुज भी पत्नी के साथ शीघ्र ही उस आश्चर्यमय घोड़े पर चढ़ा हुआ शीघ्र ही
वर्धमानपुर पहुँचा ॥१९५॥
यहाँ रूपशिखा के साथ आते हुए पुत्र शृंगभुज का पता पाकर उसका पिता वीरभुज
प्रसन्न होकर उसकी अगवानी करने के लिए नगर से बाहर निकला ॥१९६॥
वहाँ पर सत्यभामा के साथ विष्णु के समान रूपशिखा के साथ शृंगभुज को देखकर राजा ने
मानों नई राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की ॥१९७॥
घोड़े से उतरकर पत्नी के साथ पैरों पर गिरते हुए पुत्र को उठाकर, आलिंगन करके
आनन्द के आँसुओं से भरे नेत्रों से शोक-शमन रूपी मगल करता हुआ राजा हर्ष के साथ
राजधानी में प्रविष्ट हुआ ॥१९८ १९९॥
'तू कहाँ चला गया था ? —राजा से इस प्रकार पूछने पर शृंगभुज ने आरम्भ से सारा
वृत्तान्त सुनाया। और अपने भाइयों को बुलाकर निर्भासभुज को वह सोने का बाण
लौटा दिया ॥२ २ १॥
यह सब समाचार जानकर और पूछकर राजा वीरभुज अन्य सभी पुत्रों से विरक्त हो
गया और केवल शृंगभुज को ही एकमात्र पुत्र मानने लगा ॥२ २॥
उस बुद्धिमान् राजा ने सोचा कि इसे द्वेष के कारण इन भाइयों ने भगा
दिया था ॥२ ३॥
इन भाई कहलाने वाले पापी शत्रुओं ने जैसे इस निरपराध के साथ किया वैसे ही इसकी
माता के साथ इनकी माताओं ने द्वेष के कारण पाप किया है ॥२ ४॥
इसकी माता गुणवरा निर्दोष है, उसे झूठा कलंकित किया गया है। तो देर क्यों करूँ ?
आज ही इसका निश्चय करता हूँ ॥२ ५॥
ऐसा सोचकर सारे दिन पूर्व दिनों के समान कार्य करके राजा पता लगाने के लिए
अयशोलेखा नाम की रानी के पास गया ॥२ ६॥
राजा के आकस्मिक आगमन से अति प्रसन्न अयशोलेखा को राजा ने अधिक शराब
पिला दी। इस कारण शान्त-काल में सोई हुई वह रानी राजा के जागते रहने पर नशे में प्रलाप
करने लगी ॥२ ७॥
यदि मैं गुणवरा को झूठा कलङ्क न लगाती तो क्या आज राजा इस प्रकार स्वयं मेरे
पास आता ॥२ ८॥