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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 148

सप्तम लम्बक १२५

'क्यों भाई ! तुमने इस रास्ते से जाते हुए स्त्री और पुरुष को देखा है' ? तब पुरुष
वेशधारिणी वह रूपशिखा कुछ खिन्न-सी हो कर बोली—'परिश्रम के पसीने से आँखें
बन्द रहने के कारण हम दोनों ने किसी को नहीं देखा। 'हम आज राक्षसराज अग्निशिख को जलाने
के लिए अधिक लकड़ियाँ काटने में व्यस्त हैं। यह सुनकर वह परममूर्ख राक्षस सोचने लगा—ओह !
मैं कैसे मर गया यदि ऐसा है तो उस कन्या से क्या करूँगा। जाता हूँ अपने घर पर अपने आदमियों
से पूछता हूँ ॥१८ –१८२॥

ऐसा सोचकर वह अग्निशिख तुरन्त घर को लौटा और उसकी लड़की हँसती हुई
पहले के समान स्त्री-वेश में आ गई और पति के साथ आगे चली ॥१८३॥

कुछ ही क्षणों में मुस्कराते हुए अपने कुटुम्बियों से मृत्यु का निश्चय करके राक्षस फिर
लौटा वह अपन को जीवित समझकर और सुनकर प्रसन्न था ॥१८४॥

भयंकर शब्द के कारण राक्षस-पिता को फिर आते हुए जानकर घोड़े से उतरी रूपशिखा
पति को अपनी माया से छिपा दिया और रास्ते में आते हुए किसी पत्रवाहक के हाथ से पत्र
लेकर फिर पुरुष बन गई ॥१८५ १८६॥

इतने में ही राक्षस ने आकर उससे पूछा कि क्या तुमने स्त्री के साथ जाते हुए किसी पुरुष
को देखा है ? ॥१८७॥

तब पुरुषरूपा रूपशिखा लम्बी साँस भरती हुई बोली— शीघ्रता के कारण मैंने किसी को
नहीं देखा। आज युद्ध में शत्रु से मारे गये और अन्तिम श्वास लेते हुए राक्षसराज अग्निशिख से
जम्बुखण्ड से रहनेवाले अपने भाई धूम्रशिख के पास राज्य-ग्रहण करने के लिए पत्र देकर भेजा
गया मैं दूत हूँ ॥१८८–१९ ॥

यह सुनकर अग्निशिख घबराया और सोचने लगा कि 'क्या मुझे शत्रुओं ने मार डाला ?
यह जानने के लिए वह फिर अपने घर को लौटा ॥१९१॥

'कहाँ मारा गया ? मैं तो स्वस्थ हूँ'—ऐसा उसने नहीं सोचा। ब्रह्मा की मूर्ख सृष्टि
भी एक महान् आश्चर्य है ॥१९२॥

घर पहुँचकर, लोगों को हँसानेवाले समाचार को सुनकर मोह से बचा हुआ राक्षस फिर
कन्या की खोज में नहीं लौटा ॥१९३॥