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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १२३
इसलिए, न त्यागने के योग्य भी इस अपनी जन्मभूमि को मेरे लिए छोड़ दे। अपने पिता से
कह दे और उस सुगुहस्त ज्ञान को अपने हाथ में कर ले' ॥१६४॥
शृंगभुज के यह कहने पर रूपशिखा बोली—'हे प्राणप्रिय ! तुम जो आज्ञा देते हो उसे
मैं अभी करती हूँ ॥१६५॥
जन्मभूमि क्या है ? और बन्धु-बान्धव क्या हैं ? मेरे तो तुम्हीं सब कुछ हो।
सदाचारिणी स्त्रियों के लिए अपने पति के सिवा और क्या गति है ॥१६६॥
यहाँ से प्रस्थान की बात पिता से न कहनी चाहिए। वह हम लोगों को नहीं छोड़ेगा।
इसलिए, उस पापी के बिना जाने ही चल देना चाहिए ॥१६७॥
यदि सबकों से समाचार जानकर पीछे आयेगा भी तो मैं उस मूर्ख राक्षस को अपनी
माया से ठग लूँगी ॥१६८॥
रूपशिखा की बातें सुनकर दूसरे दिन शृंगभुज पिता का आधा राज्य पाई हुई और रत्नों
से भरी हुई पिटारी साथ ली हुई एवं राजकुमार के मान के बाण का अभिभूत की हुई उस
रूपशिखा के साथ उसीके शरवेग¹ नामक घोड़े पर चढ़कर बाग़ों में घूमने-टहलने के बहाने
अपने सेवकों को ठगकर, वर्धमानपुरी की ओर चल पड़ा ॥१६९-१७१॥
उन दोनों के कुछ दूर निकल जाने पर उनके जाने का समाचार जानकर राक्षस
अग्निशिख क्रोध में उनके पीछे आकाश-मार्ग से दौड़ा ॥१७२॥
उसके आने के वेग का शब्द दूर से सुनकर रूपशिखा शृंगभुज से बोली—'प्रिय ! मेरा
पिता हम लोगों को लौटाने के लिए आया है। तुम तो यहाँ निश्शंक होकर बैठो। देखो मैं कैसे
इसे ठगती हूँ॥१७३-१७४॥
मैं अपनी विद्या से तुझे ऐसा छिपा दूँगी कि वह घोड़े के साथ तुझे नहीं देख सकेगा ।
ऐसा कहकर रूपशिखा ने घोड़े से उतरकर पुरुष का रूप बना लिया ॥१७५॥
'यहाँ एक बड़ा राक्षस आ रहा है तू कुछ दूर चल बैठ'—ऐसा कहकर लकड़ी काटने के
लिए वन में आये हुए एक लकड़हारे से कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने लगी। उसे देखकर
मूर्ख राक्षस आकाश से उतरा और पूछने लगा—॥१७६-१७८॥
१. तीर के समान तेज चलनेवाला।