कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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यदि तुम्हें पीछा करता हुआ धूमशिख दीख पड़े तो तुम अपने पीछे उसके मार्ग में
मिट्टी फेंक देना ॥१३४॥
उसके अनन्तर भी यदि वह पीछा करता हुआ दीख तो तुम अपने पीछे के मार्ग में पानी
छोड़ देना। फिर भी आवे तो उन काँटों को पीछे फेंक देना और फिर भी पीछा करे तो आग को
पीछे की ओर फेंकना ॥१३५-१३६॥
ऐसा करने से तुम बिना कष्टके वहाँ आ जाओगे । मुझसे न डरो, जाओ। तुम
आज मेरी विद्या का बल देखोगे ॥१३७॥
शशिशास्त्र लेता हुआ गुणशुभ्र मिट्टी पानी आग आदि लेकर घोड़े पर सवार
होकर जंगल में स्थित मन्दिर में पहुँचा ॥१३८॥
उस मन्दिर में उसने काँटों और चोटी एवं दाढ़ी वाले गणेश को फल दिखलाकर सिर
को ढूँगा और प्रणाम करके अभिवादन का उल्लेख बताया ॥१३९॥
और, धूमशिख को नियम की बात कहकर राजकुमार शान्त होकर चुप हो
गया॥१४०॥
क्षण भर में ही जब उसने शब्द सुनाई दी दया कि धूमशिख पीछे-पीछे
आ रहा है॥१४१॥
तब उसने अपने पीछे उस दानव के मार्ग में मिट्टी फेंक दी। क्या हुआ मिट्टी से रास्ते
में बड़ा-सा पहाड़ बन गया॥१४२॥
उस पहाड़ को लाँघकर जब वह दानव का लड़का राजकुमार के पीछे दौड़ने लगा
तब ॥१४३॥
उस पानी के पड़ते ही मार्ग में बड़ी भारी तरंगों वाली अथाह बड़ी नदी बन
गयी॥१४४॥
उसने उस बड़ी नदी को भी पार कर लिया। यह देखकर गुणशुभ्र ने शीघ्र ही काँटों
को फेंक दिया। उन काँटों से मार्ग में काँटों से भरा हुआ जंगल बन गया॥१४५॥
दानव-बालक जब उस काँटोंवाले जंगल को पार कर राजकुमार के पास पहुँचा तब उसने
उसके ऊपर आग फेंक दिया ॥१४६॥
उस आग की ज्वाला से सब दिशाओं को घेर लिया। आग के लपटों से जलते हुए उस
दानव-बालक को अपने पिता का स्मरण हुआ ॥१४७॥
उसने अपने पिता का नाम लेकर कहा कि हे पिताजी! मुझे इस आग से बचाइये। तब
उसके पिता ने उससे कहा॥१४८॥