कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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हम सब एक समान रूप और वेश भूषावाली हैं। हम सब के गले में एक समान
हार पड़े हुए हैं॥१०४॥
इसलिए, मेरा पिता तुमको ठगने के लिए सभी लड़कियों को एकत्र करके ऐसा कहेगा कि
इनमें से तुम जिसे चाहते हो उसे वर लो ॥१०५॥
मैं उसके इस कपट-व्यवहार को जानती हूँ। नहीं तो यह हम सब को एकत्र क्यों कर
रहा है ॥१०६॥
वरमाला के वरण के समय मैं अपने कण्ठहार को सिरपर रख लूँगी। तब तुम मुझे पहचान
कर मेरे गले में वरमाला डाल देना ॥१०७॥
मेरा पिता मूर्ख है उसकी बुद्धि विवेकशालिनी नहीं है। इसीलिए, मुझ पुत्री के साथ
भी ऐसा व्यवहार करता है। जातिगत स्वभाव कहाँ जायगा ॥१०८॥
अतः तुम्हें ठगने के लिए यह जो-जो भी कहेगा उसे स्वीकार कर तुम मुझसे कहना—
[L13: आगे जो कर्त्तव्य है मैं करूँगी' ॥१०९॥
ऐसा कहकर रूपसिखा अपनी बहनों के पास गई। 'ऐसा ही करूँगा'—यह कहकर
श्रृंगभुज नहाने चला गया ॥११०॥
तदनन्तर रूपसिखा अपनी बहनों के साथ पिता के पास आई। उधर सेविकाओं द्वारा
स्नान कराया गया श्रृंगभुज भी आ गया ॥१११॥
तब अग्निधिश ने 'इन कन्याओं में जिसे तुम चाहते हो उसे यह माला दे दो' ऐसा
कहकर श्रृंगभुज को एक वरमाला दी ॥११२॥
उस राजकुमार ने भी माला को लेकर, पहले ही सिर पर हार की लड़ियों को रखी हुई
रूपसिखा के गले में डाल दिया ॥११३॥
तब अग्निधिश श्रृंगभुज और रूपसिखा से बोला—'कल प्रातःकाल तुम दोनों का विवाह
सम्पन्न कर दूँगा' ॥११४॥
ऐसा कहकर उन दोनों को तथा अन्य कन्याओं को उसने अपने-अपने घर जाने की
आज्ञा दी और पल-भर में ही श्रृंगभुज को बुलाकर यों बोला—॥११५॥
जाओ इन दो बैलों की गाड़ी सजाकर नगर के बाहर डर के रूप में रंगे हुए तिलों
की एक सौ गाड़ी को रोल में बो आओ—॥११६॥
यह सुनकर और 'ठीक है ऐसा कहकर घबड़ाया हुआ श्रृंगभुज रूपसिखा के
पास आकर सब वृत्तान्त बोला। तब वह भी उससे बोली ॥११७॥
'आर्यपुत्र ! तुम इस सम्बन्ध में जरा भी खेद न करो। तुम खेत की ओर जाओ। मैं
अपनी माया से सब सिद्ध कर देती हूँ' ॥११८॥