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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 108

सप्तम लम्बक ८७
वह प्रपंचबुद्धि नाम के अनुसार प्रपंचबुद्धि ही है। हे पुत्र ! वह मण्डल की पूजा में तुम्हें
श्मशान में ले जाकर तुम्हारा बलिदान करेगा ॥५९॥
इसलिए, तुम्हें मारने के लिए जो कुछ कहे वह न करना। उससे कहना कि पहले तुम
क्रिया करके हमको सिखाओ तो मैं करूँगा ॥६० ॥
जब वह तुम्हें सिखाने के लिए उस प्रकार करे, तब तुम उसकी युक्ति से रखी शस्त्र उसे
मार देना। इस प्रकार वह जिस सिद्धि को चाहता है वह तुम्हें मिलेगी' ॥६१॥
विष्णु भगवान् के ऐसा कहकर अन्तर्धान होने पर मैंने उठकर सोचा—मैंने मायावी
को भगवान् की कृपा से जाना और मुझ से वह मारा जायगा ॥६२॥
ऐसा सोचकर एक पहर रात बीतने पर नंगी तलवार लिये हुए मैं अकेला श्मशान
पहुँचा ॥६३॥
वहाँ मण्डल की पूजा किये हुए उस भिक्षु को देखकर मैं उसके समीप गया। वह भी धूर्त
मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए बोला—॥६४॥
आँखें बन्द करके अंगों को फैलाकर नीचे मुँह किये हुए पृथ्वी पर प्रणाम करो। राजन् !
इस प्रकार हम दोनों को एक समान सिद्धि प्राप्त होगी' ॥६५॥
तब मैंने उससे कहा—'पहले तुम इस प्रकार प्रणाम करो। पहले मुझे करके दिखाओ
तब मैं भी इसी प्रकार करूँगा' ॥६६॥
ऐसा सुनकर वह मूर्ख श्रमण उसी प्रकार करने लगा। मैंने तलवार से उसका सिर काट
डाला ॥६७॥
इसके बाद ही आकाश से वाणी हुई 'राजन् ! बहुत अच्छा किया जो इस पापी भिक्षु का
बलिदान कर डाला ॥६८॥
इसलिए मैं धनाधिप कुबेर, तुम्हारे धैर्य से प्रसन्न हूँ। इसलिए, मुझसे और जो कुछ
चाहता है वह और वर माँग। ऐसा कहकर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर सामने आये कुबेर
को प्रणाम करके मैंने कहा—'भगवन् ! आवश्यकता पड़ने पर मैं जब भी तुमसे प्रार्थना करूँ
तब तुम स्मरण-मात्र से उपस्थित होकर मुझे वर प्रदान करना ॥६९—७१॥
ऐसा ही होगा' मुझ ऐसा कहकर कुबेर अन्तर्धान हो गया और मैं सिद्धि प्राप्त करके
शीघ्र अपने भवन में आया ॥७२॥
यह मैंने तुम्हें अपना वृत्तान्त सुना दिया। अब उसी कुबेर देवता के वर से मदनमाला का
प्रत्युपकार करता हूँ ॥७३॥