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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ८५
यह सुनकर मन्त्री ने कहा- 'महाराज ! उस भिक्षु ने आपका कौन-सा उपकार किया
उसे बताइए। राजा ने कहा- 'सुनो उसकी कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ-॥४५-४६॥
प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा
प्राचीन समय में पाटलिपुत्र (पटना) में प्रपंचबुद्धि नाम का भिक्षु (तपस्वी) प्रतिदिन
दरबार में आकर मुझे एक बन्द डिब्बा देता था। एक वर्ष तक प्रतिदिन वह डिब्बा देता रहा
और मैं उसे उसी प्रकार (बिना खोले ही) भाण्डागार के अधिकारी को दे देता था॥४७-४८॥
एक बार उस भिक्षु से दिया गया रत्न का डिब्बा दैवयोग से मेरे हाथ से गिरकर दो
टुकड़े हो गया। उसके अन्दर से आग के समान जलता हुआ चमकीला रत्न निकला मानो उस
डिब्बे ने पहले मेरे द्वारा न जाने हुए अपने हृदय का प्रदर्शन किया ॥४९-५०॥
उसे देखकर मैंने सभी पुराने डिब्बे मँगाये और उनके खोलने पर सबमें ऐसे चमकीले
बहुमूल्य रत्न निकले ॥५१॥
तब मैंने प्रपंचबुद्धि से पूछा 'आश्चर्य है कि तुम ऐसे अमूल्यरत्नों से मेरी सेवा क्यों
कर रहे हो? ॥५२॥
तब वहाँ से सब लोगों को हटाकर वह भिक्षु बोला-'इसी आनेवाली कृष्ण
चतुर्दशी को मैं रात के समय एक विद्या की सिद्धि करूँगा। उसमें बाहरी सहायता के लिए
तुम्हारे ऐसे वीर की आवश्यकता है। वीर की सहायता से विघ्न दूर होने पर सहज में ही
सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं' भिक्षु के ऐसा कहने पर मैंने उसकी सहायता करना स्वीकार कर
लिया ॥५३-५५॥
उसके प्रसन्न होकर चले जाने पर और कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कृष्ण पक्ष की
चतुर्दशी तिथि आई। मैंने उस भिक्षु की बात का स्मरण किया ॥५६॥
तब प्रातःकाल उठकर अपना नित्यकर्म करके सायंकाल की प्रतीक्षा करने लगा।
सायंकाल की सन्ध्या-विधि करके मैं रात्रि में जल्दी ही सो गया ॥५७॥
निद्रा आते ही स्वप्न में गरुड़ पर बैठे हुए लक्ष्मी को गोद में लिये भगवान् पद्म-
नाभू ने आदेश दिया-॥५८॥