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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक १९५
तब पत्नी-सहित उस मित्र के साथ प्रतापसेन (पिता) के पास जाकर अपना सारा वृत्तान्त
शूरमीसेन ने सुनाया ॥१८४॥
और, उसके दिये हुए क्रम से प्राप्त राज्य को अपने छोटे भाई शूरसेन को देकर वह
विद्याधर-लोक को गया ॥१८५॥
वहाँ जाकर हेमप्रभा से युक्त लक्ष्मीसेन अपने सपत्नीक मित्र मन्त्री के साथ चिरकाल
तक दिव्य आनन्द का उपभोग करता रहा ॥१८६॥
गोमुख द्वारा इस प्रकार कही गई कथाओं को सुनकर, शक्तियशा के आसन्नवर्ती
नवीन विवाह के लिए उत्सुक होने पर भी नरवाहनदत्त ने उस रात्रि को क्षण के समान बिता
दिया ॥१८८॥
इस प्रकार विवाह-दिवस की अवधि को विनोदपूर्वक व्यतीत करके उस राजकुमार
नरवाहनदत्त ने विवाह का दिन आने पर पिता वत्सेश्वर के पास रहते हुए, सहसा आकाश से
उतरते हुए और सूर्य के समान चमकते हुए विद्याधरों के दल को देखा ॥१८९॥
उस दल के मध्य दान की इच्छा से अपनी कन्या को लेकर, प्रेम से आये हुए विद्याधरों के
राजा स्फटिकयश को देखकर, श्वशुर की अगवानी करके नरवाहनदत्त ने उसकी अभ्यर्थना की
और समधी वत्सराज उदयन ने भी अर्घ्य-पाद्य आदि से उसका समुचित सत्कार किया ॥१९०॥
विद्याधरों के उस राजा ने भी वत्सराज से यथार्थ बात निवेदन करके अपनी सिद्धि
के प्रभाव से अपने स्वरूप के अनुसार विवाह की दिव्य सामग्री एकत्र करके रत्नों के समूह से भर
दिए गए वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त के लिए पहले से ही कही गई शक्तियशा नाम की अपनी
कन्या विधि-पूर्वक प्रदान कर दी ॥१९१॥
वह नरवाहनदत्त भी विद्याधरराज की कन्या उस शक्तियशा को अपनी पत्नी के
रूप में प्राप्त करके इस प्रकार खिल उठा जैसे रश्मियों को पाकर कमल खिल
उठता है ॥१९२॥
विवाह-संस्कार समाप्त करके स्फटिकयश के अपने लोक को चले जाने पर नरवाहनदत्त
अपनी नगरी कौशाम्बी में शक्तियशा के मुख-कमल का भ्रमर बनकर रहने लगा ॥१९३॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का
दशम तरङ्ग समाप्त
शक्तियश नामक दशम लम्बक समाप्त