कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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दूसरे दिन उसी प्रकार राजा से बातचीत करके और बाहर निकलकर वहाँ आये हुए
उस अधिकारी से धूर्त ने कहा—'मैंने युक्तिपूर्ण बातों से राजा को तुम पर प्रसन्न कर
दिया है। अब घबराओ नहीं धीरज रखो। अब मैं तुम्हारी त्रुटियों (अपराधों) का रक्षक
हूँ ॥१२५-१२६॥
इस प्रकार स्वीकार कर उसे विदा किया और उस अधिकारी ने भी विविध प्रकार से
उसकी सेवा की ॥१२७॥
इस प्रकार, उस चतुर धूर्त ने सभी अधिकारियों सामन्तों राजपुत्रों और सेवकों से
भिन्न-भिन्न युक्तियों द्वारा सभी ओर से राजा से बातें करते हुए पाँच करोड़ दीनार कमा
लिये ॥१२८-१२९॥
तब एकबार एकान्त में वह धूर्त मन्त्री राजा से बोला—'स्वामिन् ! आपको पाँच सौ
दीनार प्रतिदिन देकर भी मैंने तुम्हारी कृपा से पाँच करोड़ दीनार कमा लिये। इसलिए, यह
सोना आप ले लो। इसमें मेरा क्या है ? ऐसा कहकर उसने सोना राजा के सामने रख दिया।
राजा ने भी बड़ी कठिनाई से उसमें से आधा ही धन लिया ॥१३० -१३२॥
और, उससे प्रसन्न होकर उसे महामन्त्री बना दिया। उस धूर्त ने भी धन पाकर दान और
भोग में उसका उपयोग किया ॥१३३॥
इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति अधिक पाप किये बिना भी धन प्राप्त कर लेते हैं।
जिस प्रकार, कुँआ खोदनेवाले को फल की प्राप्ति (जल-लाभ) भी होती है और उसे पाप भी
नहीं लगता ॥१३४॥
मन्त्री गोमुख राजकुमार को इस प्रकार कथा सुनाकर बोला—'अब विवाह के लिए
उत्सुक दूसरी कथा सुनो ॥१३५॥
रत्नाकर नाम के नगर में बुद्धिप्रभ नाम का एक राजा था जो मदोन्मत्त शत्रु-रूपी हाथियों
के लिए सिंह के समान था ॥१३६॥
उसकी रत्नरेखा नाम की रानी से हेमप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। वह कन्या
सारे संसार में एकमात्र सुन्दरी थी और शाप के कारण मर्त्यलोक में अवतीर्ण
विद्याधरी थी। वह आकाश में विहार करने के पूर्व-संस्कार के कारण झूला झूलने में बहुत रुचि
रखती थी ॥१३७-१३८॥
पिता ने गिर जाने के भय से उसे अनेक बार मना किया किन्तु वह न मानी। तब
उसके पिता राजा ने उसे एक बार एक चाँटा मार दिया ॥१३९॥