कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तब पराजित राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि शत्रु शस्त्रों से अजेय है। अतः अच्छा हो
कि इसपर बुद्धि से विजय प्राप्त करें ॥१५॥
भले ही कुछ लोग निन्दा करें किन्तु मेरी प्रतिज्ञा झूठी न होनी चाहिए—ऐसा सोचकर
और राज्यकार्य का भार, मन्त्रियों पर डालकर एक सौ राजपूतों तथा पाँच विशेष अंगरक्षकों के
साथ गुप्त रूप से साधु का वेश बनाकर राजा विक्रमादित्य प्रतिष्ठानपुर पहुँचा ॥१६-१८॥
वहाँ जाकर वह राजा राजभवन के समान महान् और सुन्दर मदनमाला नाम की वेश्या के
भवन में जा पहुँचा ॥१९॥
वह विशाल भवन (वायु से कम्पित करहा की झंडियों के) हिलते हुए वस्त्रों से मानो
अतिथियों को हाथ से आमन्त्रित करता था। उस भवन के पूर्वी द्वार पर बीस हजार सैनिक
सिपाही दिन-रात रक्षा करते थे और अन्य तीनों दिशाओं के द्वारों पर दस दस हजार शूर-वीर
सैनिक पहरा देते थे ॥२०-२२॥
वह भवन कहीं घोड़ों की फैंकी हुई पंक्तियों से शोभित हो रहा था। कहीं हाथियों की
चल-बन्द से भरा हुआ था। कहीं विविध अस्त्र-शस्त्रों की सुन्दर सजावट थी। कहीं चमचमाते
रत्नों और खजानों से उज्ज्वल था। कहीं संगीत और मृदंग की मधुर स्वर-लहरी लहरा रही
थी। सात प्राकारों (परों) से बँधे हुए उस भवन को देखता हुआ राजा मदनमाला के ऊँचे
भवन पर पहुँचा ॥२३-२७॥
मदनमाला ने उन प्राकारों में अभिप्राय के साथ हाथी घांट आदि को देखते हुए उस
राजा के गुप्तचरों द्वारा समाचार जानकर उस गुप्त बने हुए उच्च कोटि का व्यक्ति समझ लिया
और उसके आने पर उसकी अगवानी करती हुई उसे समझदार समझ बड़ी अभिलाषा और
आदर के साथ लाकर राजाओं के योग्य आसन पर बिठाया ॥२८-२ ९॥