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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक [right-aligned: १९१]

तब उसके मठ में पहुँचते ही अन्य मूर्ख उसे घेरकर बैठ गए और कहाँ गए थे ?
उनके ऐसा पूछने पर मूर्ख ने कैलास-यात्रा का सारा वृत्तान्त उन्हें सुना दिया ॥१९॥

सुनकर आश्चर्य चकित वे सभी मूर्ख उससे प्रार्थना करने लगे कि 'हम लोगों पर भी
कृपा करो हमें भी वहाँ ले चलो। हम लोगों को भी दिव्य लड्डू खिलाओ' ॥१९१॥

उनकी बातें सुनकर और वहाँ जाने की युक्ति बताकर दूसरे दिन तालाब के पास वह
उन्हें ले गया और बैल भी वहाँ आया ॥१९२॥

तब उन मूर्खो के मुखिया महन्त ने दोनों हाथों से उसकी पूँछ पकड़ ली। उसके
पैर दूसरे ने पकड़े और उसके तीसरे ने। इस प्रकार सभी मूर्खों ने एक-दूसरे के पैर पकड़-पकड़कर
एक लम्बी पंक्ति-सी बना ली। तब वह बैल वेग से आकाश में उड़ा। पूँछ से लटके हुए अनेक मूर्खो
वाले बैल के आकाश में जाते समय दैवयोग से उनमें से एक ने मुखिया से पूछा—'मन के अनुकूल
फल देनेवाले स्वर्गलोक के प्रति हमारी उत्सुकता बढ़ाइए और यह बताइए कि तुमने कितने बड़े
बड़े लड्डू वहाँ खाये थे ? ॥१९३—१९५॥

तब अपने मिससिल को भूलकर उस मूर्ख महन्त ने बैल की पूँछ छोड़ दी और दोनों हाथों
को कमल की तरह मिलाकर कहा—'इतने-इतने बड़े' ॥१९६॥

जब वह उन्हें हाथ के इंगित से बता ही रहा था कि तबतक वे सब के-सब मूर्ख खड़-मुड़
होकर आकाश से नीचे गिर गये और बैल अपनी तीव्र गति से कैलास को चला गया। यह
देखकर जनता पेट पकड़कर हँसने सभी मूर्खों की प्रश्नोत्तर-क्रिया भी विवेक-रहित होती
है ॥१९७-१९९॥

महाराज तुमने आकाश में जानेवाले मूर्ख सुने। अब दूसरे को सुनिए एक मूर्ख मार्ग में
चलते हुए सही मार्ग भूलकर विपरीत मार्ग पर जा रहा था। लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा कि
'नदी के किनारे जो पेड़ है उसके ऊपर के मार्ग से जाओ। वह मूर्ख पेड़ के पीछे जाकर उस
पर चढ़ गया। डाल पर चलते हुए उस पेड़ की लचीली पतली डालियाँ नीचे झुक गईं। किन्तु
उसने अगली डाल को हाथ से पकड़ लिया और नदी के ऊपर झूलने लगा। क्योंकि लोगों ने उसे
पेड़ के पीछे से जाने को बताया था ॥२००-२०१॥
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