कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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उस अद्भुत उद्यान को देखकर वत्सराज ने स्वागतातिथ्य में व्यग्र कलिङ्गसेना से पूछा
कि 'यह सब क्या है ? ॥१४७॥
तब कलिङ्गसेना सबके सामने राजा से बोली—'महाराज ! विश्वकर्मा का अवतार
मयासुर नाम का एक महान् असुर है, जिसने इन्द्र की आज्ञा से युधिष्ठिर का सुन्दर नगर बनाया
था। सोमप्रभा नाम की उसी की कन्या मेरी सखी है। उसने रात में मेरे पास आकर अपनी माया
के और अपने ही प्रेम से मेरी कन्या के लिए यह उद्यान बनाया है' ॥१४८-१५०॥
ऐसा कहकर, और भी सहेली ने भूत एवं भविष्य की जो बातें बताई थीं राजा को
उसी प्रकार सुना दीं ॥१५१॥
तब सभी ने कलिङ्गसेना की बात को प्रामाणिक मानकर, संशय-रहित होकर परम हर्ष
और विश्वास प्रकट किया ॥१५२॥
वत्सराज ने वह समस्त दिन अपनी स्त्री और पुत्र आदि के साथ कलिङ्गसेना के स्वागत
में ही व्यतीत किया ॥१५३॥
दूसरे दिन देव-मन्दिर में दर्शन के लिए गये राजा ने सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्राभरणों
से अलंकृत स्त्रियों को देखा ॥१५४॥
'तुम सब कौन हो'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वे स्त्रियाँ कहने लगीं—'हम सब
विद्याएँ और कलाएँ हैं और तुम्हारे पुत्र के लिए यहाँ आई हैं ॥१५५॥
अब जाकर उसी में प्रवेश करती हैं, इतना कहने के उपरान्त वे सब अन्तर्धान हो गईं
और आश्चर्यचकित राजा भी मन्दिर के भीतर गया ॥१५६॥
उसने वहाँ जाकर यह वृत्तान्त अपनी रानियों और मन्त्रियों को सुनाया। सब उसे देवता
का अनुग्रह समझकर उसका अभिनन्दन करने लगे ॥१५७॥
तदनन्तर राजा की आज्ञा से वासवदत्ता ने भी वीणा उठाई और राजकुमार नरवाहनदत्त
ने मन्दिर में प्रवेश किया ॥१५८॥
वीणा बजाती हुई माता से राजकुमार ने नम्रतापूर्वक कहा—'तुम्हारी वीणा स्थान
(स्वर-स्थापन की मात्रा) से भ्रष्ट हो रही है ॥१५९॥
तदनन्तर तू इसे ले और बजा' पिता की आज्ञा पाकर वीणा बजाते हुए राजकुमार ने
गन्धर्वो को भी विस्मित कर दिया ॥१६०॥
इस प्रकार, सभी विद्याओं और कलाओं में पिता द्वारा परीक्षित राजकुमार ने उत्तीर्णता
प्राप्त की। वह स्वयं सब कुछ जान गया था ॥१६१॥