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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ४८१
तुम उसका अपहरण करके उसके स्थान पर इस रति को मनुष्य बनाकर रख
देना' ॥४४॥
इस प्रकार ईश्वर (शिव) की आज्ञा को शिर स स्वीकार करके ब्रह्मा के चले जाने के
पश्चात् समय आने पर कलिगसेना ने प्रसव किया ॥४५॥
इतने में ही प्रजापति ने अपनी माया के प्रभाव से उसके पुत्र का अपहरण करके रति
को मानुषी कन्या बनाकर अलक्षित रूप से उसके समीप रख दिया ॥४६॥
दिन में भी अकालज प्रतिपदा की चन्द्रलेखा के समान उदित उस कन्या की उत्पत्ति का
वहाँ रहनेवाले सभी लोगों ने सत्य समझा ॥४७॥
वह कन्या अपने शरीर की कान्ति से रत्नों की प्रभा को निस्तेज करती हुई प्रसूति-गृह
को आलोकित कर रही थी ॥४८॥
कलिगसेना ने अनन्यसदृशी (अद्भुत) कन्या को देखकर पुत्रजन्म से भी अधिक हर्ष और
प्रसन्नता के साथ व्यापक उत्सव मनाया ॥४९॥
तदनन्तर वत्सराज उदयन ने अपनी रानियों और मन्त्रियों के साथ कलिङ्गसेना द्वारा उत्पन्न
हुई अनुपम कन्या का वृत्तान्त सुना ॥५०॥
सुनते ही भगवत्प्रेरित राजा ने शची और यौगन्धरायण के सामने ही इस प्रकार
कहा—'मैं समझता हूँ कि यह कलिङ्गसेना शाप से पतित कोई स्वर्गीय स्त्री है। इससे उत्पन्न
हुई यह कन्या भी दिव्य ही है, क्योंकि इसका रूप आश्चर्यमय है ॥५१-५२॥
इसलिए यह कन्या रूप में मेरे कामदेव के समान है। यह नरवाहनदत्त की महारानी होने
के लायक है ॥५३॥
राजा के ऐसा कहने पर वासवदत्ता ने राजा से कहा-'महाराज, आज तुम यह क्या कह
रहे हो? कहाँ मातृकुल और पितृकुल दोनों से शुद्ध यह तुम्हारा कुल और कहाँ व्यभिचारिणी से
उत्पन्न कलिङ्गसेना की कन्या ?' ॥५४-५५॥
यह सुनकर सोचते हुए राजा ने कहा-'यह मैं स्वयं नहीं कह रहा हूँ, कोई मेरे अन्तर में
बैठा हुआ कोई मुझसे कहला रहा है ॥५६॥
और ऐसी आकाशवाणी भी सुन रहा हूँ कि यह कन्या नरवाहनदत्त की पूर्वजन्म की
पत्नी है। साथ ही उसमदिरानुगा कलिङ्गसेना की यह पतिव्रता पत्नी है। पूर्व जन्मानुरूप कर्म के
कारण उसके लिए सुरपत्नी शब्द का प्रयोग हुआ है ॥५७-५८॥