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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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उषा साक्षात् आते हुए अनिरुद्ध को देखकर इस प्रकार अपने अंगों से बाहर हो गई
जिस प्रकार चन्द्र-दर्शन से समुद्र की बेला अपनी सीमा से बाहर हो जाती है ॥२९॥
तदनन्तर उषा मन्त्री द्वारा दिये गये मूर्तिमान् जीवन के समान उस प्राणप्यारे अनिरुद्ध
के साथ सुखपूर्वक रहने लगी ॥३०॥
इस बात को जानकर वृद्ध बाणासुर को अनिरुद्ध ने अपने तथा अपने पितामह श्रीकृष्ण
के बल से जीत लिया ॥३१॥
तदनन्तर अभिप्रेतशरीर ये दोनों द्वारकापुरी में जाकर पार्वती और शंकर के समान
प्रसिद्ध हुए ॥३२॥
इस प्रकार उषा को सखी चित्रलेखा ने शीघ्र ही उसके प्रियतम से उसे मिला दिया था।
हे सखि मैं तुम्हें चित्रलेखा से भी अधिक प्रभावशालिनी समझती हूँ ॥३३॥
इसलिए उस वत्सराज को यहाँ ले आओ। विलम्ब न करो। कलिङ्गसेना से ऐसा सुन
कर सोमप्रभा बोली—॥३४॥
'वह चित्रलेखा देवस्त्री थी इसलिए दूसरे पुरुष को उठा लाई किन्तु पर-पुरुष का स्पर्श
भी न करनेवाली मैं यह कार्य कैसे कर सकती हूँ ॥३५॥
इसलिए तुझे ही वहाँ ले जाती हूँ जहाँ वत्सराज है। उससे पहले मैं तुम्हें माँगनेवाले
प्रसेनजित् को भी दिखा दूँगी' ॥३६॥
कलिङ्गसेना की कौशाम्बी-यात्रा
इस प्रकार सोमप्रभा से कही गई कलिङ्गसेना उसकी बात को मानकर उसके साथ माया-
यन्त्र-चालित आकाशयान से अपने सामान और अंतरंग सेवकों के साथ माता-पिता से छिपकर
चली गई ॥३७-३८॥
सच है कामदेव द्वारा वेगवती धारा में पहुँचाई गई स्त्रियाँ ऊँचा-नीचा नहीं देखतीं
जिस प्रकार सरपट चाल से चलते हुए घोड़े का सारथी ऊँचा-नीचा नहीं देख पाता ॥३९॥
पहले श्रावस्ती नगरी में पहुँचकर शिकार के लिए निकले हुए और वृद्धावस्था से पीले
पड़े हुए प्रसेनजित् को उसने दूर से ही देखा ॥४०॥
उस राजा के दोनों ओर डुलाये जाते हुए चँवर, मानों सोमप्रभा को 'इस वृद्ध से दूर
रहो'—इस प्रकार कहकर दूर से ही निषेध कर रहे थे ॥४१॥
हँसती हुई सोमप्रभा ने कलिङ्गसेना से उस राजा को दिखाते हुए कहा—'देखो यही
वह वृद्ध प्रसेनजित् राजा है। जिसे तुम्हारा पिता तुम्हें दे रहा है ॥४२॥