कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextयह सुनकर स्थूलदत्त ने उस हरिशर्मा को बुलवाया। हरिशर्मा ने कहा—'कल से
भूख हुए मुझे आज घोड़ा खोने पर आपने याद किया' ॥१९५॥
तब 'हमारी भूल को क्षमा करना' ऐसा कहते हुए स्थूलदत्त ने पूछा—हमारा घोड़ा
किसने चुराया यह बताओ' ॥१९६॥
उसके यह पूछने पर हरिशर्मा भूमि पर झूठी रेखाएँ खींचता हुआ बताने लगा कि यहाँ
से दक्षिणी सीमा के पास चोरों ने घोड़ा रखा है ॥१९७॥
यह छिपा हुआ है, सायंकाल होने पर चोर उसे दूर ले जायेंगे ॥१९८॥
यह सुनकर उधर दौड़कर ढूँढ़ते हुए बहुत-से लोगों ने घोड़ा पा लिया और हरिशर्मा के
विज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसे घर ले आये ॥१९९॥
तभी से 'विद्वान् है'—ऐसा समझकर स्थूलदत्त से सम्मानित हरिशर्मा जनता में भी
सम्मानित हुआ और सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा ॥१००॥
कुछ दिनों के उपरान्त उस नगर के राजा के यहाँ सोना रत्न आदि की चोरी हो
गई। जब चोरों का पता न लगा तब ज्योतिषी के नाम से प्रसिद्ध हरिशर्मा को राजा ने
बुलवाया ॥१०१-१०२॥
बुलवाये हुए हरिशर्मा ने व्यर्थ समय व्यतीत करके कहा कि 'सवेरे बताऊँगा'। तब
राजा ने सुरक्षा के साथ उसे किसी कमरे में ठहरा दिया ॥१०३॥
राजा के यहाँ जिह्वा नाम की एक सेविका थी। उसने अपने भाई की सहायता से राज
महल से चोरी कराकर धन का अपहरण किया था ॥१०४॥
वह जिह्वा चोरी के कारण शंकितहृदय होकर रात को हरिशर्मा के निवास पर
आकर द्वार से कान लगाकर सुनने लगी। उस समय हरिशर्मा कमरे में अकेला बैठा हुआ झूठा
विज्ञान बतानेवाली अपनी जिह्वा (जीभ) की निन्दा कर रहा था ॥१०५-१०६॥
'हे जिह्वा लोभ की लम्पट —तूने यह क्या किया ? दुराकाङ्क्षी अब उसका दंड सहन
कर' ॥१०७॥
यह सुनकर भयभीत सेविका इसने मुझे जान लिया ऐसा सोचकर प्राणदंड के भय से
व्याकुल होकर उसी उपाय में हरिशर्मा के पास पहुँची ॥१०८॥
और उस बनावटी ज्योतिषी के चरणों में गिरकर कहने लगी —'हे ब्राह्मण मैं ही वह
जिह्वा हूँ जिस धनरत्नादि को तुमने जान लिया है ॥१०९॥