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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 710

षष्ठ लम्बक १५५
अभी तक एक घाव तो भरा नहीं तबतक यह दूसरा घाव उत्पन्न हो गया। यह कहावत
सच है कि छिद्रों में अधिक अनर्थ होते हैं। जिस संसार-मार्ग से लोग जाते हैं और नष्ट होते हैं
भला उस संसार-मार्ग को कौन बन्द कर सकता है। ऐसा सोचकर और उल्टा अपराध पड़ने
और पकड़े जाने की शंका से वह मूर्ख पिशाच भागकर अन्तर्धान हो गया ॥१८६-१८७॥
इस प्रकार कन्या द्वारा ठगकर उस पिशाच से छुड़ाया हुआ वह नीरोग ब्राह्मण सुख
पूर्वक रहने लगा ॥१८४॥
पिशाच ऐसे होते हैं। इसी प्रकार बालक राजपुत्र भी होते हैं। वे सिद्ध होकर भी
अनर्थकारी होते हैं। उनसे बचने के लिए बुद्धि द्वारा अपनी रक्षा करनी चाहिए। किन्तु कुलीन
राजपुत्रियाँ ऐसी कही सुनी नहीं गईं। इसलिए हे सखि मेरी संगति (मैत्री) के सम्बन्ध में तुम
ऐसी कुछ विरुद्ध बात न समझना ॥१८६-१८६॥
कलिंगसेना के मुंह से हास्य अद्भुत और मधुर रस से पूर्ण इस प्रकार की कहानी
सुनकर सोमप्रभा प्रसन्न हुई ॥१८७॥
और कहने लगी सखि ! मेरा घर यहाँ से साठ योजन (२४ कोश) पर है। दिन
छिप रहा है। बहुत देर तक यहाँ रुक गई। अतः अब जाती हूँ ॥१८८॥
धीरे-धीरे सूर्य के अस्ताचल पर्वत शिखर की ओर जाने पर, फिर आने की उत्कंठा रखती
हुई सखी कलिङ्गसेना को पुचकार क्षण-भर के लिए व्यथित करती हुई वह सोमप्रभा अपने घर को
चली गई ॥१८९॥
इधर वह कलिङ्गसेना भी घर के कमरे में जाकर सोमप्रभा के आश्चर्य और विविध कौतुक
पूर्ण सम्बन्ध में सोचने लगीं कि म सूझ रही यह मेरी सखी सोमप्रभा क्या कोई सिद्ध नारी है वा
अप्सरा है अथवा विद्याधरी है॥१९ ॥
आकाश में सञ्चरण करनेवाली यह अवश्य ही कोई दिव्य स्त्री है। दिव्य स्त्रियाँ भी
मानव-स्त्रियों के साथ असाधारण स्नेह और मित्रता रखती हैं। क्या पूर्व समय में राजा पृथु की
कन्या के साथ दिव्य अरुन्धती की मित्रता नहीं थी उसी के प्रेम से राजा पृथु कामधेनु गौ को पृथ्वी
पर नहीं लाया ? ॥१९१॥
उस कामधेनु का दूध पीने से ही क्या पृथु राजा भ्रष्ट होने पर भी फिर स्वर्ग नहीं गया ?
तब से लेकर पृथ्वी पर निरन्तर गायों की सृष्टि नहीं हुई ? इसलिए मैं भी धन्य हूँ। किसी भार्य
शुभ फल के लिए ही यह दिव्य कन्या मेरी सखी बनी है। अब प्रातःकाल उसके आने पर
भली-भाँति उसके कुल नाम आदि का पता मालूम करूँगी ॥१९२॥