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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 708

षष्ठ लम्बक ६५३
जबतक पिशाच प्रकट होकर स्वयं यह न कहे कि मैं तुम्हारे घाव को अच्छा कर देता हूँ
तबतक बोलना नहीं। उसके कहने पर उसका अभिनन्दन करना वह तुम्हारा रोग अच्छा कर
देगा'। मित्र के कहने पर उस ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। फलतः वह पिशाच सिद्ध हो गया।
तदनन्तर उसने हिमाचल से औषधि लाकर उससे उस नाड़ीव्रण (नासूर) को अच्छा कर दिया।
घाव के अच्छे हो जाने पर ग्रह के समान लगा हुआ वह पिशाच कहने लगा—'मुझे दूसरा घाव
दो तो मैं उसे अच्छा करूँ॥१६७—१६९॥
अन्यथा मैं कोई अनर्थ कर डालूँगा या तुम्हें मार डालूँगा'। यह सुनकर उस भयभीत
ब्राह्मण ने शीघ्र ही पीछा छुड़ाने के लिए कहा—'मैं सात दिनों में तुम्हें दूसरा घाव दूँगा'। इस
प्रकार पिशाच से मुक्त वह ब्राह्मण जीवन के प्रति निराश हो गया॥१७०—१७२॥
इतना कहकर कलिङ्गसेना मध्य में ही अभीष्ट कथा आन के कारण लज्जा से चुप हो
गई और सोमप्रभा से फिर कहने लगी॥१७३॥
दूसरा व्रण (घाव) मिलने न अत्यन्त पीड़ित अपने पिता को देखकर ब्राह्मण की चतुर
और विपश्चा कन्या सब सब बात जानकर इससे बोली—'मैं उस पिशाच को ठग लूँगी। तुम
उससे जाकर कह दो कि मेरी कन्या को नाड़ीव्रण (नासूर) है उसे भर दो'॥१७४-१७५॥
यह सुनकर प्रसन्न ब्राह्मण पिशाच के जाकर उसी प्रकार बोला और उसे अपनी कन्या के
पास ले आया॥१७६॥
उस कन्या ने उस पिशाच को एकान्त में अपना गुह्याङ्ग (जननन्द्रिय) दिखाते हुए कहा
इसे भर दो॥१७७॥
उस मूर्ख पिशाच ने उसके गुह्याङ्ग पर औषधि रस आदि अनेक प्रयोग किये किन्तु वह
उसे भर न कर पाया॥१७८॥
कुछ दिनों के पश्चात् वह आकर उसने उस कन्या के स्तनों पर कण्ठ का गहना उसे
भली भाँति देखना चाहा था कि वह व्रण क्यों नहीं भर रहा है इतने में ही उसे उसका दूसरा व्रण
(स्तनद्वय) दिखाई पड़ा। उसे देखकर घबड़ाया हुआ मूर्ख पिशाच सोचने लगा॥१७९-१८०॥