कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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तदनन्तर उसे अपने पास बैठाकर उससे उसका कुल और नाम आदि पूछने लगी।
उत्तर में सोमप्रभा ने कहा 'सब कहती हूँ ठहरो। एवंक्रमेण उन दोनों की बात ही बात में
मित्रता हो गई। यह मित्रता दोनों ने परस्पर हाथ से हाथ मिलाकर की॥११११॥
तब सोमप्रभा ने कहा—'सखि तुम तो राजकुमारी हो। राजसन्तानों के साथ मित्रता
करना कठिन कार्य है। वे लोग छोटे-से ही अपराध से अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं। इस विषय में
राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा कहती हूँ सुनो॥१११-११२॥
एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा
पुष्करावती नगरी में गृहसेन नाम का राजा था। उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह घमंडी
राजकुमार, जो भी भला या बुरा करता था राजा उसे सहन करता था क्योंकि वह उसका
एकमात्र बालक था॥११३॥
किसी समय उद्यान में भ्रमण करते हुए राजकुमार ने अपने ही समान रूप और वयवाले
उसे दत्त नामक बनिये के पुत्र को देखा। उसे देखते ही राजकुमार ने स्वयं वरण किया हुआ मित्र
बना लिया तभी से राजपुत्र और वैश्यपुत्र दोनों एकरूप (अभिन्न मित्र) हो गये॥११४-११६॥
उन दोनों में एक दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकता था। पूर्व जन्म का संचित प्रेम
शीघ्र ही बाँध लेता है॥११७॥
राजपुत्र ऐसी किसी भी वस्तु का उपभोग नहीं करता था जिसके कि एक भाग को वैश्य
पुत्र के लिए नहीं रख लेता था॥११८॥
एक बार उस मित्र का विवाह पहले ही निश्चित करके वह राजकुमार अपने विवाह के
लिए अहिच्छत्रा नगरी को चला॥११९॥
उस मित्र के साथ हाथी पर सवार सैनिकों से युक्त राजकुमार यात्रा करते हुए सायंकाल
इक्षुमती नदी के तट पर ठहर गया॥१२०॥
वहाँ चन्द्रोदय होने पर मद्यपान करके शय्या पर लेटा हुआ राजकुमार, अपनी सेविका
से प्रार्थना किये जाने पर कहानी सुनाने लगा॥१२१॥
मद्य से आक्रान्त राजकुमार कहानी प्रारम्भ करते ही निद्रामग्न हो गया। किन्तु सेविका
और वह वैश्यपुत्र दोनों स्नेह के कारण जागते रह गये॥१२२॥
तदनन्तर सब के सो जाने पर वैश्यपुत्र जागता रह गया और उसने आकाश में स्त्रियों की
धी बातें सुनी॥१२३॥