कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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इस जन्म या पूर्वजन्म के किये हुए अपने ही भले-बुरे कर्मों के प्रभाव से सुरों और
असुरों-सहित समस्त संसार कर्मानुसार विविध भोगों का भोग करता है॥१२ ॥
जो शुक्ल ध्यान से आकाश से गिरती हुई उपमा को जो पेट में प्रवेश करती हुई
देखा है हे राज्ञी ! वह निष्कलङ्क कोई देव योनि का प्राणी अपने पूर्वजन्म कहीं समाप्त
हुआ है ॥१३ ।
अपने पति राजा कलिङ्गसेन से यह सुनकर रानी तारादत्ता परम हर्षित हुई॥ १३॥
प्रथम तरंग समाप्त
दूसरा तरंग
कलिङ्गसेना के जन्म की कथा
तदनन्तर रूपलावण्य मयी व राजा कलिङ्गसेन की रानी तारादत्ता गर्भ भार से धीरे
धीरे आलसने लगी॥१॥
प्रसव काल के समीप आने पर वह रूपवती और चपल नेत्रवालो (पुतलियों) में
आश्चर्य भरी चञ्चल बाल्यावस्थावाली पुत्री रत्न का अवतार करने लगी। २॥
कुछ ही दिनों के पश्चात् उसने रूपलावण्य मयी कन्या उत्पन्न हुई जो साक्षात् सौन्दर्य
की प्रतिमा के समान थी ।३।
राजा पुत्र न होने पर भी कन्या उत्पन्न होने पर ही बहुत प्रसन्न हुआ और उसने बड़ा
उत्सव मनाया ॥४॥
उस रूपवती कन्या का नाम कलिङ्गसेना रक्खा गया क्योंकि रूप-सौन्दर्य में वह अप्सराओं
से भी अधिक रूपवती थी और कलिङ्गसेन के कन्या होने से वह कलिङ्गसेना ही कहलायी ॥५॥
राजा अपनी उस रूपवती पुत्री को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसने उसके लिए अनेक
दास-दासियों की व्यवस्था की और उसका लालन-पालन बड़े स्नेह से होने लगा ॥६॥
शनैः-शनैः वह कन्या शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगी और
उसके रूप-लावण्य को देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे ॥७॥