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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ६९५
इसलिए वह मेरा पति नहीं हो सकता है। अब तुम्हीं मेरे भर्त्ता हो जिसने अपने
जीवन की चिन्ता न करके मुझे मृत्यु-मुख से निकाला॥१८०॥
वह मेरा पति नौकरों के साथ आ रहा है। अब तुम भी हमारे पीछे धीरे-धीरे आओ।
अवसर मिलने पर जहाँ कहीं म, चले जायेंगे। उसके इस प्रस्ताव को मैंने स्वीकार कर लिया
॥१८१ १८२॥
'यह सुन्दरी है और मुझे आत्म-समर्पण कर चुकी है। फिर भी उस परकीया स्त्री से
क्या प्रयोजन ? —यह तो धैर्य का मार्ग है यौवन का नहीं॥१८३॥
कुछ ही देर में आकर पति द्वारा आश्वस्त की गई वह बाला उसके और उसके भृत्यों के
साथ आगे-आगे चलने लगी॥१८४॥
उस स्त्री द्वारा गुप्त रूप से दिये गये मार्ग-भोजन को लिया हुआ मैं भी उसके पीछे छिप
छिपकर दूर तक चला गया॥१८५॥
उस स्त्री ने हाथी के भय से भागने पर टूटे हुए शरीर की पीड़ा के बहाने मार्ग में उस
पति को अपने शरीर पर हाथ भी नहीं रखने दिया॥१८६॥
सच है अनुरक्त और आकृष्ट, गाढ़ी अन्तर्वेदना के दुःख से कुम्हलाई और बिगड़ी हुई स्त्री
सर्पिणी के समान किसका अपकार किये बिना रह सकती है?॥१८७॥
क्रमशः चलते हुए हम लोग शोभनपुर नामक पुर में पहुँचे जहाँ पर व्यापार से जीविका
करनेवाले उस स्त्री के पति का घर था॥१८८॥
उस दिन हमलोग नगर के बाहर एक देव-मन्दिर में ठहर गये। वहीं पर मुझे यह दूसरा
मित्र ब्राह्मण मिला॥१८९॥
हमलोगों की उस नवीन और प्रथम परिचय में ही परस्पर परम विश्वास और प्रेम
उत्पन्न हो गया। सच है प्राणियों का चित्त पूर्वजन्म के संचित प्रेम को भलीभाँति समझ
लेता है॥१९०॥
तब मैंने अपना सारा रहस्य इसे बता दिया। यह सब सुन लेने के पश्चात् इसने मुझे
धीरे से कहा—'चुप रहो। जिस लिए तुम यहाँ आये हो उसका उपाय है। इस बनिये की स्त्री
की बहिन यहाँ है। वह धन लेकर मेरे साथ यहाँ से भागनेवाली है। उसीकी सहायता
से तुम्हारा काम सिद्ध करेगा ॥१९१-१९२॥
ऐसा कहकर यह ब्राह्मण चला गया और बनिये की स्त्री की ननद अर्थात् उसकी
बहिन को इसने सब सच्चा समाचार सुना दिया॥१९३॥
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