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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ६७
भ्रमण करते समय मैं एकाग्र चित्त से गले पर तलवार गिरने के भय से तैल की ओर
दृष्टि लगाये हुए उस बचाने में तल्लीन था' ॥५१ ॥
वैश्यपुत्र के ऐसा कहने पर राजा ने कहा—'जिस प्रकार दीखते हुए भी तैल पर दृष्टि
लगाये हुए तुमने सारे भ्रमण में कुछ नहीं देखा उसी प्रकार की तल्लीनता से तुम आत्मा के ध्यान
में लग जाओ। आत्मा को एकाग्र वृत्ति से देखनेवाला व्यक्ति बाहरी वृत्तियों से हटकर आन्तरिक
तत्त्व को देखता है॥५१-५२॥
जिसे तत्त्व का ज्ञान हो जाता है वह फिर कर्मजाल के बन्धन में नहीं बँधता। यह मैंने
तुझे संक्षेप में मोक्ष का उपदेश कर दिया' ॥५३॥
इस प्रकार राजा से उपदेश पाकर और उसके चरणों में गिरकर, प्रसन्नचित्त वह वैश्यपुत्र
अपने घर गया॥५४॥
इस प्रकार स्नेह से प्रजा का पालन करनेवाले उस राजा की तारादत्ता नाम की कुलीन
रानी थी ॥५५॥
सच्चरित्रा और सुन्दरी उस रानी से अनेक दृष्टान्तों का रसिक वह राजा इस प्रकार
शोभित होता था जिस प्रकार सुकवि भारती से शोभित होता है॥५६॥
प्रकट होते हुए गुणों से सराहनीय वह रानी अमृतमय उस राजा से उसी प्रकार अभिन्न
थी जैसे अमृतमय चन्द्रमा से चाँदनी अभिन्न होती है॥५७॥
उस महारानी के साथ सुखपूर्वक रहते हुए उस राजा के दिन इन्द्राणी के साथ रहते हुए
इन्द्र के समान व्यतीत होने लगे॥५८॥
सुरभिदत्ता अप्सरा की कथा
इसी कथा की सन्धि में स्वर्ग में इन्द्र के यहाँ एक महोत्सव हुआ। उस महोत्सव में
वेश्याओं के सभी वर्गों के सम्मिलित होने पर भी सुरभिदत्ता नाम की वेश्या वहाँ नहीं दीख
पड़ी ॥५९ ½ ॥
इन्द्र ने योगबल द्वारा उसे किसी विद्याधर के साथ नन्दन-वन में क्रीड़ा करते
हुए देखा॥६१॥
यह देखकर मन में क्रुद्ध इन्द्र ने सोचा कि ये दोनों कामान्ध दुराचारी हैं। एक अप्सरा
तो मुझे भूलकर उद्दण्डता कर रही है दूसरा यह विद्याधर भी इस देवभूमि में आकर यह जो अविशय
कर रहा है यह आश्चर्य है॥६२-६३॥
अथवा इस बेचारे विद्याधर का क्या दोष है? इसे तो यही वेश्या अपने रूपजाल में
फँसाकर ले आई है॥६४॥