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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 602

पञ्चम लम्बक ५५३
'बेटा उस समय श्मशान में रात के समय जब तू राक्षस बन गया था तब क्या हुआ
बताओ' ॥२७२॥
तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी मैंने बाल-स्वभाव-सुलभ चंचलता से चिता में जलते
हुए कपाल को दैववश फोड़ डाला ॥२७३॥
उससे निकली हुई चर्बी की धारा जब मेरे मुख में पड़ी, तब माया से मूढ़ मैं उसी समय राक्षस
बन गया ॥२७४॥
तदनन्तर दूसरे राक्षसों ने मेरा नाम कपालस्फोट रखकर अपनी मंडली में बुलाया और
मैं भी उसमें सम्मिलित हो गया ॥२७५॥
वे लोग मुझे अपने साथ राक्षसों के राजा के समीप ले गये। उसने मुझे देखकर प्रसन्नता
प्रकट की और मुझे अपना सेनापति बना दिया ॥२७६॥
उसके पश्चात् एक बार राक्षसराज ने घमंड में आकर गन्धर्वों पर चढ़ाई कर दी और
वह स्वयं युद्ध में मारा गया ॥२७७॥
तब से उसके सेवकों ने मेरा शासन स्वीकार किया और मैंने उसके नगर में रहकर राक्षसों
पर राज्य किया ॥२७८॥
वहाँ पर अकस्मात् सोन के कमल लाने के लिए जाय हुए आर्य (बड़े भाई) अशोकदत्त
के दर्शन से वह मेरी राक्षसी दशा समाप्त हो गई ॥२७९॥
उसके पश्चात् शाप से मोक्ष होने पर हमलोगों ने अपनी विद्याएँ जैसे प्राप्त कीं यह सब
आर्य अशोकदत्त आपको सुनावेंगे' ॥२८०॥
विजयदत्त के इस प्रकार कहने पर अशोकदत्त ने सारी कथा प्रारम्भ से सुनाई —॥२८१॥
पूर्वकाल में हम दोनो विद्याधर थे। उस समय हम दोनों ने गालव मुनि के आश्रम में गंगा
स्नान करती हुई मुनि-कन्याओं को देखा ॥२८२॥
समान अभिलाषावाली उन कन्याओं को चाहते हुए हम लोग एकान्त स्थान ढूँढ़ने लगे।
दिव्य दृष्टिवाले हमारे गन्धुओ ने इस रहस्य को जानकर हमें शाप दिया ॥२८३॥
'तुम दोनों पापाचारी मनुष्य-योनि में उत्पन्न होओ। उस योनि में भी तुम दोनो का विचित्र
वियोग होगा ॥२८४॥
मनुष्यों से अगम्य दूर देश में एक-दूसरे को देखकर अपने तत्त्व को जानोगे ॥२८५॥