कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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पंचम लम्बक ५५१
इस प्रकार कहते हुए विजयदत्त को छाती से चिपकाकर अशोकदत्त ने अपनी अश्रु-धाराओं
से जबतक उसके राक्षस-भाव से दूषित शरीर को धो डाला। इतने में ही प्रलम्बोष्ठिक नामक
विद्याधरों के गुरु आकाश-मार्ग से उतरकर उन दोनों भाइयों से बोले—'तुम सभी विद्याधर हो।
शाप के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हो। अब तुमलोगों का वह शाप समाप्त हो गया है।
अतः अब तुम अपनी विद्याओं को ले लो और अपने बन्धु विद्याधरों की श्रेणी में मिल जाओ।
अब अपने स्थान को जाओ और अपने बन्धु-बान्धवों को स्वीकार करो'। उसने ऐसा कहकर
और विद्या देकर गुरु चले गये ॥२५७—२६१॥
तदनन्तर उन्होंने अपने को पहिचाना और वे दोनों विद्याधर हो गये और स्वर्ग-कमलों
को लेकर विद्या के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा हिमालय-शिखर-स्थित अपने स्थान को चले
गये ॥२६२॥
वहाँ पर अशोकदत्त राक्षसराज की पुत्री अपनी पत्नी के पास गया। फलतः वह भी
विद्याधरी हो गई ॥२६३॥
उस सुनयना के साथ वे दोनों भाई आकाश-मार्ग से क्षण-भर में वाराणसी आ
गये ॥२६४॥
वहाँ आकर वियोग की अग्नि में तपे हुए माता-पिता को अपने दर्शन-रूपी अमृत-वर्षा
से उन्होंने शान्त किया ॥२६५॥
शरीर का भेद न होने पर भी उसी शरीर में दूसरे जन्म का अनुभव करते हुए वे दोनों
न केवल माता-पिता के ही प्रत्युत सारी जनता के लिए प्रसन्नता देनेवाले हुए ॥२६६॥
विजयदत्त को बहुत दिनों के पश्चात् प्राप्त करने पर प्रगाढ़ आलिङ्गन करते हुए उनके
पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ॥२६७॥
वाराणसी का राजा और अशोकदत्त का श्वशुर प्रतापकूट भी यह समाचार सुनकर
प्रसन्न होकर वहाँ आ गया ॥२६८॥
उनके द्वारा सम्मानित अशोकदत्त उजाड़ा न सुन्दर वाराणसी नगरी में गया जहाँ
उसकी पत्नी राजकुमारी उत्सुक हो उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥२६९॥
राजभवन में राजा को उपहार में बहुत-से स्वर्ग-कमल दिये। इच्छा से भी अधिक
कमलों के मिलने से राजा अत्यधिक प्रसन्न हुआ॥ ७ ॥
एकबार परिवार के साथ बैठे हुए गोविन्दस्वामी ने आश्चर्य के साथ विजयदत्त से
पूछा—॥२७०॥