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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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यह सुनकर बहू कहने लगी कि 'मेरे पास दूसरा स्वर्ण-कमल कहाँ है। यह हमारे राजा
कपालस्फोट का सरोवर वीज रहा है, उसमें इस प्रकार के स्वर्ण-कमल होते हैं। उन्हीं में से एक
कमल राजा ने मेरे पति को प्रेम से दिया था॥२४३-२४४॥
सास के ऐसा कहने पर अशोकदत्त ने कहा—'तब तुम मुझे उस सरोवर पर ले चलो।
मैं स्वयं स्वर्णकमल ले लूँगा'॥२४५॥
उसकी सास ने उससे कहा—'यह सम्भव नहीं है। बड़े-बड़े भीषण राक्षस उस सरोवर
की रक्षा करते हैं।' इस प्रकार सास द्वारा निषेध करने पर भी उसने अपना हठ नहीं छोड़ा॥२४६॥
तब किसी प्रकार उस सास द्वारा वहाँ न जाय जान पर उसने दिव्य स्वर्ण-कमलों से
युक्त और हिमालय की ऊँची चोटी पर स्थित उस सरोवर को देखा॥२४७॥
वह सरोवर, सूर्य की किरणों का निरन्तर पान करने के कारण सूर्य की प्रभा के समान
चमकते हुए ऊँचे-ऊँचे एवं विकसित स्वर्ण-कमलों से ढका हुआ था॥२४८॥
वहाँ जाकर जब वह कमलों को चुनने लगा तब भयानक रक्षक राक्षसों ने उसे
रोका॥२४९॥
तब अशोकदत्त ने भी शस्त्र निकालकर उन्हें मारना प्रारम्भ किया। फलतः कुछ राक्षस
भय से भागकर अपने स्वामी कपालस्फोट के पास पहुँचे और उन्होंने उससे निवेदन किया॥२५०॥
यह सुनकर क्रोध से भरे हुए राक्षसराज ने स्वयं आकर टूटे हुए स्वर्ण-कमलों के साथ
अशोकदत्त को देखा॥२५१॥
उसने आश्चर्य के साथ अपने भाई को पहचानकर सोचा कि 'यह मेरा भाई अशोक-
दत्त यहाँ कैसे आ गया'॥२५२॥
तब हर्ष के आँसुओं से भरी हुई आँखोंवाला वह राक्षसराज शस्त्र को फेंककर दौड़कर
उसके पैरों पर पड़कर कहने लगा— मैं विजयदत्त नाम का तुम्हारा छोटा सहोदर भाई हूँ। हम
दोनों ब्राह्मणश्रेष्ठ गोविन्दस्वामी के पुत्र हैं। दैववश मैं इतने दिनों तक राक्षस बन गया था।
चिता में पड़े हुए कपाल (सिर) को फोड़ने के कारण मेरा नाम कपालस्फोट पड़
गया। इस समय तुम्हारे दर्शन से मुझे ब्राह्मणत्व का स्मरण हो आया और अज्ञान से बुद्धि को
ढक देनेवाला मेरा राक्षसपन अब मुझसे निकल गया॥२५३-२५६॥