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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 594

पंचम लम्बक ५४७
दूसरे दिन राजा ने अपने पूजा-गृह में उस स्वर्ण-कमल को चाँदी के कलश में स्थापित
कर दिया॥२२८॥
श्वेत और रक्त वे दोनों कलश और पद्म इस प्रकार शोभित हो रहे थे मानों राजा और
अशोकदत्त के क्रमशः यश और प्रताप हों॥२२९॥
उसकी अनुपम शोभा देखकर शिवभक्त राजा ने हर्ष से आँखें फाड़ते हुए भक्तिरस के
आवेश में कहा—'अहा ! इस स्वर्ण-कमल से यह कलश ऊँचा होकर ऐसा प्रतीत हो रहा है,
जैसे हिम-धवल शिवजी अपने लाल-पीले जटाभार से ऊँचे और शोभित होते हैं' ॥२३०-२३१॥
यह सुनकर अशोकदत्त ने कहा —'महाराज ! मैं आपके लिए दूसरा कमल भी ला दूँगा।
तब उत्तर देते हुए राजा ने उससे कहा—'मुझे दूसरे कमल की आवश्यकता नहीं तुम साहस न
करो'॥२३२-२३४॥
कुछ दिन व्यतीत होने पर भी अशोकदत्त की दूसरे स्वर्ण-कमल को लाने की इच्छा बनी
रही। इतने में ही कृष्ण चतुर्दशी आ गई॥२३५॥
उस दिन अशोकदत्त की स्वर्ण-कमल लाने की इच्छा जानकर, आकाश-सरोवर के स्वर्ण
कमल सूर्य के भय से अस्त हो जाने पर, सन्ध्या के समान लाल मेघ-रूपी मांस का ग्रास करने के गर्व
से मानों तम-रूपी धूएँ से धूमिल राक्षसों के इधर-उधर दौड़-धूप करने पर चमकती हुई दीपमाला-
रूपी दाँतों की पंक्ति से भीषण अति भीषण रात्रि राक्षसी के मुँह के खुलने पर वह अशोकदत्त
शयन करती हुई राजपुत्रीवाले अपने भवन से चुपचाप निकलकर फिर उसी श्मशान में जा
पहुँचा ॥२३६-२३९॥
वहाँ पर उसने उसी वटवृक्ष की जड़ में बैठी हुई और स्वागत करती हुई अपनी राक्षसी
सास को देखा॥२४०॥
तदनन्तर वह युवक उसके साथ फिर हिमालय-शिखर पर स्थित उसके घर पर गया
जहाँ उसकी पत्नी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥२४१॥
कुछ समय तक अपनी पत्नी के साथ वहाँ निवास करके अशोकदत्त अपनी सास से बोला
कि 'मुझे दूसरा स्वर्ण-कमल दो' ॥२४२॥