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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 592

पंचम लम्बक ५४५
अशोकदत्त पुनः आने का निश्चय करके आभूषण और कमल लेकर उस नगर से निकला
और उस भास ने अपनी सिद्धि द्वारा आकाश-मार्ग से उसे उसी श्मशान में पहुँचा
दिया ॥२१४॥
उसी वृक्ष की जड़ में बैठकर वह उससे फिर कहने लगी कि मैं सदा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी
की रात्रि में यहाँ आती हूँ। इसलिए तू उस दिन रात को जब-जब यहाँ आयेगा तब-तब मुझे
इसी वटवृक्ष के नीचे पायेगा ॥२१५-२१६॥
ऐसा सुनकर और 'ठीक है' ऐसा कहकर, उस राक्षसी से विदा लेकर अशोकदत्त अपने
पिता के घर आया ॥२१७॥
छोटे लड़के के (विजयदत्त के) वियोग-दुःख को दूना करनेवाले अशोकदत्त के वियोग से
उसके माता-पिता अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥२१८॥
जब अशोकदत्त ने अचानक आकर अपने माता-पिता को सुखी किया तब यह समाचार
सुनकर उसका श्वसुर राजा भी वहीं आ गया ॥२१९॥
वहाँ आकर महासिंह के स्पर्श से मानो डरे हुए, अतएव रोमांचितयुक्त अंगों से राजा ने
प्रणाम करते हुए अशोकदत्त को लिपटा लिया ॥२२०॥
तब अशोकदत्त राजा के साथ राजभवन में गया। वहाँ जाकर उसने मूर्तिमान् आनन्द के
समान पायजेब का जोड़ा और लक्ष्मी के क्रीड़ा-कमल के समान वह सुन्दर स्वर्ण-कमल उसने राजा
को समर्पित किया ॥२२१-२२३॥
कुछ समय के अनन्तर रानी के साथ बैठे हुए राजा ने कौतूहलवश पूछे गये अशोकदत्त ने
कानों को आनन्द देनेवाले अपने वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनाया ॥२२४॥
साहस बिना किये विविध प्रकार के उपभोग से चेतना को चमत्कृत करनेवाला स्वरूप
फल प्राप्त नहीं होता ॥२२५॥
इस प्रकार कहते हुए राजा और रानी उन जामाता से अपने को धन्य-धन्य समझने
लगे ॥२२६॥
द्वार में बजनेवाला घण्टा और दीवाल मूर्द्धनरत्न राजभवन मानो अशोकदत्त के
गुणों का गान कर रहा था ॥ २२७॥
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