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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 578

पञ्चम लम्बक ५३१
तदनन्तर उसका पिता गोविन्दस्वामी 'हाय बेटा ! हाय मुनी विजयदत्त ! -इन शब्दों
के साथ रोता-चिल्लाता हुआ वहाँ से चला गया ॥११०॥
वहाँ से चण्डी के मन्दिर में जाकर उसने प्रातःकाल अपनी पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र अशोक-
दत्त से रात की वह सारी घटना सुना दी ॥१११॥
देवी-दर्शन के लिए आया हुआ वाराणसी का रहनेवाला एक तपस्वी तथा अन्य एकत्र
यात्री-गणों बिना मेघ के वज्रपात के समान इस घटना के संबंध में सुनकर गोविन्द स्वामी के
दुःख में समवेदना प्रकट करने लगे ॥११२-११३॥
इतने में ही देवी-पूजन के लिए वहाँ समुद्रदत्त नाम का एक धनी वैश्य आया। उसने इस
प्रकार दुःखी गोविन्दस्वामी के पास जाकर उसे धैर्य प्रदान किया ॥११४॥
तदनन्तर वह सज्जन बनिया गोविन्द स्वामी को सपरिवार अपने घर ले गया और
स्नान भोजन आदि की आवश्यक व्यवस्था करा दी। विपद्ग्रस्त प्राणियां पर दया करना उच्च
व्यक्तियों का स्वभाव होता है ॥११५-११६॥
महातपस्वी के बचन पर विश्वास करके पुत्र के पुनर्मिलन की आशा से गोविन्दस्वामी ने
किसी प्रकार धैर्य धारण किया ॥११७॥
तब से लेकर उस महाधनी बनिये की प्रार्थना पर उसने वाराणसी में उस बनिये के घर
ही रहना निश्चित किया ॥११८॥
वहाँ पर विद्या प्राप्त करके उसका पुत्र अशोकदत्त युवक हो गया और कुश्ती लड़ना
सीखने लगा ॥११९॥
धीरे-धीरे वह मल्लविद्या (पहलवानी) में निपुण हो गया। संसार में किसी भी दूसरे
पहलवान के लिए उसे जीतना कठिन था ॥१२० ॥
एक बार किसी देवयात्रा के मेले में दक्षिण-देश का एक विख्यात मल्ल (पहलवान)
वाराणसी आया और उसने काशिराज प्रतापनुकुट के सभी पहलवानों को उनके सामने ही पछाड़
दिया ॥१२१-१२२॥
तब राजा ने उस बनिये से अशोकदत्त की प्रशंसा सुनकर, उसे बुलवाकर लड़ने की
आज्ञा दी ॥१२३॥