कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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राजा ने पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली उस कन्या को अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ देखकर
और उसके मनानुकूल वर मिलने में कोई दूसरा उपाय न देखकर अपने देश में आये हुए यात्रियों
के लिए प्रतिदिन इसी प्रकार का डिंडोरा पीटने की आज्ञा दे दी ॥२३२॥
'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने कनकपुरी देखी हो, वह बताये राजा उस युवराज-पद
के साथ अपनी कन्या देंगे'। इस प्रकार ललकारने से सभी जगह घोषणा होने लगी किन्तु कनकपुरी
देखा हुआ एक व्यक्ति भी नहीं मिल पाया ॥२३३॥
प्रथम तरङ्ग समाप्त।
द्वितीय तरंग
शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना
इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति-
देव सोचने लगा ॥१॥
'कनकपुरी मैंने देखी है'—इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त
अपमान प्राप्त किया है ॥२॥
अत उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा
जबतक मैं उस नगरी को न देख लूँ या प्राणों का त्याग न कर दूँ ॥३॥
उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से
ही क्या लाभ है ? ॥४॥
ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्धमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल
पड़ा ॥५॥
क्रमशः चलते हुए उस शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य भाग का महान् और घोर वन-
प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में
प्रविष्ट हुआ ॥६॥
वायु से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त
उसके शरीर पर मानों पंखा झल रहा था ॥७॥
सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं से मारे जाते हुए मृग आदिकी करुण चीत्कारों के बहाने अनेका-
नैक चोर-डाकुओं के पराभव-दुःख के कारण मानो वह वन दिन-रात रोता रहता था ॥८॥