कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 542 of 876
Read in contextपंचम लम्बक ४१५
वह प्रातःकाल ही घनी और चिकनी मिट्टी से शरीर पर लेप करता था मानों बिना
तरंगों के कीचड़ के लेप का मुखपाठ कर रहा हो ॥१९३॥
वह नदी के तट पर स्नान करके बहुत देर तक नीचे की ओर मुंह किये खड़ा रहता था
मानों अपने कुकर्मों से होनेवाली अधोगति का अभ्यास कर रहा हो ॥१९४॥
स्नान करके उठा हुआ वह चिरकाल तक सूर्य की ओर मुंह करके खड़ा रहता था
मानों अपने को शूली पर चढ़ाने के योग्य बना रहा हो ॥१९५॥
स्नान करके हाथ में कुशा की मुट्ठी लेकर जप करता हुआ वह पद्मासन लगाकर बैठा
हुआ दम्भी ब्राह्मण के समान मालूम होता था ॥१९६॥
बीच-बीच में वह साधु पुरुषों के हृदयों के समान सुन्दर पुष्पों का हरण करके शिवजी
की पूजा किया करता था ॥१९७॥
पूजन करने के पश्चात् भी वह जप करने की बनावटी मुद्रा बनाये रहता था मानों अपने
कुकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले नरकों का ध्यान करता हो ॥१९८॥
अपराह्न के समय वह मौन धारण करके द्विजो (ब्राह्मणो) के घरों से भिक्षा
प्राप्त करने के लिए दण्ड लेकर और कृष्णाजिन¹ पहनकर जाता था और तीन भिक्षायें
लेता था ॥१९९॥
और तीन गल्प के समान वह भिक्षा के तीन भाग करता था ॥२००॥
एक भाग कौवा का एक भाग अतिथि का और दम्भ के बीज के समान एक भाग से वह
अपना पेट भरता था ॥२०१॥
भोजन के बाद मानों अपने पापों को गिनता हुआ वह फिर जप-माला लेकर जप करने
का झूठा ढोंग रचा करता था ॥२०२॥
वह रात में उस मठ के अन्दर नगरनिवासियो के गूढ़म हरंख्याना को सोचता हुआ
अकेला ही रहता था ॥२०३॥
इस प्रकार प्रतिदिन वंचनापूर्ण कपट रूप करते हुए उसने नागरिका के मन को अपनी
ओर आकृष्ट कर लिया ॥२०४॥
ओह यह तो बड़ा ही शान्त तपस्वी है—इस प्रकार चारों ओर उसकी प्रसिद्धि हो गई
और सभी नागरिक उनके सामन भक्ति से प्रणाम करने लगे ॥२०५॥
१ कृष्णाजिन = काले मृग का चर्म ।