Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 484 of 876

Read in context
Page 484

चतुर्थ लम्बक ४४१
मैंने अपने प्राणदान का बदला इस प्रकार चुकाकर और प्रेम से भीलराज को अपने घर
लाकर उसका बहुत दिनों तक स्वागत-सत्कार किया॥७३॥
अन्त में उसका समुचित सत्कार करके उसे घर भेज दिया। वह भीलराज भी अपना
प्रेमपूर्ण हृदय देकर अपने गाँव की ओर गया॥७४॥
घर जाकर मेरा प्रत्युपकार करने (बदला देने) के लिए अपने समीप के मोती
कस्तूरी आदि को भी उसने पर्याप्त नहीं समझा॥७५॥
इसलिए मेरे लिए बहुमूल्य और दुर्लभ गजमुक्ता¹ प्राप्त करने के लिए वह धनुष-बाण के
साथ हिमाचल को गया॥७६॥
वहाँ घूमते हुए उसने देवमन्दिर के साथ एक बड़े तालाब को देखा जहाँ मित्र अर्थात्
सूर्य से प्रीति रखनेवाले खिले कमलों को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ॥७७॥
उस तालाब में पानी पीने के लिए आनेवाले हाथियों की आशा से उन्हें मारने के लिए
धनुष लिये हुए वह एकान्त में वहीं छिप गया॥७८॥
छिपकर उसने देखा कि एक अद्भुत सुन्दरी कुमारी शिव-पूजन के लिए सिंह पर सवार
होकर तालाब पर आई॥७९॥
वह भीलराज शिवजी की पूजा के लिए कन्या के रूप में आई हुई दूसरी हिमाचल-
नन्दिनी पार्वती के समान उसे देखकर आश्चर्यचकित हो मन में सोचने लगा कि 'यह कौन कन्या
है यदि मानव-कन्या है, तो वह सिंहवाहिनी कैसे यदि देवकन्या है तो मुझ-जैसे लोग इसे कैसे
देख सकते हैं।' अतः अवश्य ही यह मेरी आँखों के पूर्व-पुण्यों की शरीरधारिणी
मूर्ति है॥८०-८२॥
यदि इस सुन्दरी से मैं अपने मित्र वसुदत्त का सम्बन्ध करादूँ तो यह उसका समुचित
प्रत्युपकार हो सकता है॥८३॥
'इसलिए इसकी इच्छा जानने के लिए मैं इसके समीप जाता हूँ'—यह सोचकर वह मित्र
उसके पास गया॥८४॥
तब वह कन्या छाया में बैठे हुए शेर से उतरकर पूजा के लिए पुष्प-चयन करने
तालाब उतरी॥८५॥
उस कन्या ने पास आकर प्रणाम करते हुए, प्रथम बार ही देखे हुए भिल्लराज को
अतिथि-प्रेम के कारण स्वागत करते हुए प्रसन्न किया—और पूछा 'तू कौन है तथा इस दुर्गम
भूमि में कैसे आया है? उसके इस प्रकार पूछने पर भीलराज बोला—॥८६-८७॥
१ गज-हाथी मुक्ता=मोती। हाथी के मस्तक से निकला मोती बहुमूल्य और कल्याणकारी होता है।
५६