Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 472 of 876

Read in context
Page 472

चतुर्थ लम्बक ४२९
उसी समय आये हुए वत्सराज उदयन ने रानी की चिन्ता का कारण जानकर कहा—
देवि ! नारद मुनि ने कहा है कि शिवजी की आराधना करने पर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ॥१४०॥
ऐसा कहकर राजा ने शिवजी का व्रत करने का निश्चय किया। रानी के व्रत ग्रहण
करने पर राजा ने भी मन्त्रियों और राज्य की प्रजाओं के साथ शंकर की आराधना का व्रत
किया ॥१४१ १४२॥
तीन रातों तक उपवास करते हुए राजा और रानी को प्रसन्नता से प्रकट होकर शिवजी
ने स्वयं आज्ञा दी—'तुम दोनों उठो ! तुम्हें कामदेव का अंश पुत्र उत्पन्न होगा जो मेरी कृपा
से विद्याधरों का राजा होगा ॥१४३ १४४॥
स्वप्न में ऐसा वरदान देकर शिवजी के अन्तर्धान हो जाने पर, प्रातःकाल उठकर वर
को पाये हुए राजा और रानी ने हार्दिक आनन्द का अनुभव किया ॥१४५॥
तदनन्तर उठकर राजा ने मन्त्रियों तथा प्रजाओं को देखे हुए स्वप्न के समाचार-रूपी
अमृत-रस से तृप्त कर दिया और उन दोनों ने अपने बन्धु-बान्धवों और सेवकों के साथ उत्सव
मनाते हुए व्रत का पारण (समाप्ति) किया ॥१४६॥
और कुछ दिनों के बीतने पर स्वप्न में रानी वासवदत्ता को किसी जटाधारी पुरुष ने
आकर फल प्रदान किया ॥१४७॥
रानी के द्वारा उस स्वप्न का वृत्तान्त जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और मन्त्रियों
ने उसे बधाइयां दीं। राजा भी फल के समान शिवजी द्वारा दिये गये पुत्र को समझकर शीघ्र ही
पूर्ण होने की आशा करने लगा ॥१४८॥
नरवाहनदत्तजनन नामक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त
द्वितीय तरंग
वत्सराज की कथा—पुत्र-जन्म
कुछ दिनों के अनन्तर वासवदत्ता ने शीघ्र ही वत्सराज के हृदय को आनन्द देनेवाले
और कामदेव के अंशावतार से उज्ज्वल गर्भ का धारण किया ॥१॥