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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४३१
राजकुमार भी अपने पैतृक राज्य को प्राप्त कर और अपने गुणों से प्राप्त चक्रवर्ती
की कन्या को पत्नी-रूप में स्वीकार कर परम आनन्द का उपभोग करने लगा। अर्थात् काम्पि-
ल्यनगरेन्द्र ने उसकी वीरता से प्रसन्न होकर उसे अपनी कन्या दे दी ॥१९६॥
इस प्रकार साहसिक काल में स्त्रियों का जो हृदय वज्र के समान कठिन होता है, वही
आकस्मिक व्याकुलता होने पर पुष्प से भी कोमल हो जाता है ॥१९७॥
अन्तःपुर में वल्लभ मन्त्री के समान चरित्रवती और स्वच्छ हृदयवाली स्त्रियाँ तो इनी-
गिनी ही होती हैं जो संसार का भूषण होती हैं ॥१९८॥
राजलक्ष्मी हरिणी के समान सदा उछलती-कूदती और छलाँगें मारती रहती है। उसे
धैर्य-रूपी पाश में बाँधना कुछ ही बुद्धिमान् जानते हैं, सभी नहीं ॥१९९॥
इसलिए सम्पत्ति बाहुल्यवाले को घोर विपत्ति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए ॥२००॥
मैंने भी इस घोर विपत्ति काल में अपने चरित्र की जो रक्षा की है, आपका दर्शन उसी
का परिणाम है ॥२०१॥
इस प्रकार ब्राह्मणी के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी वासवदत्ता उसके प्रति आदर
की भावना से सोचने लगी— ॥२०२॥
अवश्य ही यह ब्राह्मणी उच्चकुल-प्रसूता है। इसकी उदारता और अपने चरित्र को
प्रकट करने का ढंग और वार्तालाप की शैली यह बात बता रही है ॥२०३॥
इसी प्रकार राजसभा में आने की चतुरता भी इसकी उच्चता बता रही है। ऐसा
सोचकर रानी ब्राह्मणी से फिर बोली— 'तुम किसकी स्त्री हो और क्या विशेष परिस्थिति है,
कहो। यह सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी ॥२०४-२०५॥
पिंगलिका की आत्मकथा
हे महारानी! मालवदेश में अग्निदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। वह लक्ष्मी और सरस्वती
दोनों का आश्रय था, याचकों का स्वयं धन देनेवाला था ॥२०६॥
उसीके समान उसके क्रमशः दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम शंकरदत्त और
छोटे का नाम शान्तिकर था ॥२०७॥
छोटा पुत्र शान्तिकर, बाल्यकाल में ही विद्याध्ययन के लिए पिता के घर से कहीं चला
गया ॥२०८॥
बड़े पुत्र शंकरदत्त ने यज्ञ के लिए सम्पत्ति एकत्र करनेवाले यज्ञदत्त की कन्या (मुझसे)
विवाह कर लिया ॥२०९॥