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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 456

चतुर्थ लम्बक ४१५
पिङ्गलिका ब्राह्मणी की कथा
किसी एक दिन प्रातःकालीन सभा (दरबार) में बैठे हुए वत्सराज से नित्योदित नामक
मुख्य द्वारपाल ने आकर निवेदन किया—हे महाराज दो बच्चोंवाली एक दरिद्र ब्राह्मणी आपके
दर्शन की अभिलाषा से द्वार पर खड़ी है॥३८-३९॥
यह सुनते ही राजा से उसके प्रवेश की आज्ञा पाकर दुबली-पतली मैली-कुचैली एक
ब्राह्मणी राजा के सम्मुख उपस्थित हुई॥४०॥
अपने सम्मान के समान फटे-पुराने वस्त्र से लिपटी हुई और दैन्य एवं दुःख के समान
अपने दोनों बालकों को गोद में लिये हुई वह ब्राह्मणी राजा का समुचित अभिवादन करके बोली—
मैं कुलीन घर की ब्राह्मणी हूँ और परिस्थितिवश ऐसी दरिद्रावस्था में आ गई हूँ। ये एक साथ दो
अर्थात् जुड़वाँ बच्चे उत्पन्न हो गये। मेरे भोजन का ठिकाना नहीं है। इसलिए इन बच्चों को मैं
दूध नहीं पिला सकती॥४१-४३॥
इसलिए हे महाराज मैं दुखिया शरण में आये हुए पर दया करनेवाले आपकी शरण में
आई हूँ। अब आप जो उचित समझें करें॥४४॥
यह सुनकर दयालु राजा ने द्वारपाल को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर महारानी वासवदत्ता
को सौंप दो॥४५॥
तब वह अपने शुभकर्म के समान आगे चलनेवाले उस द्वारपाल ने उसे महारानी वासव-
दत्ता के पास पहुँचा दिया॥४६॥
द्वारपाल से यह जानकर कि 'इसे महाराज ने भेजा है'—रानी वासवदत्ता ने उस
ब्राह्मणी पर अत्यन्त दया प्रकट की॥४७॥
दो बच्चोंवाली उस दीन ब्राह्मणी को देखकर रानी सोचने लगी कि विधि की यह विपरीत
गति है कि वन्द्य वस्तु से उसे डाह होता है और न-वस्तु से प्रेम होता है। अभी तक मुझे एक
बालक भी नहीं हुआ और इसके एक साथ ही दो हो गये॥४८-४९॥
ऐसा सोचती हुई रानी स्नान करने गई और दासियों को उस ब्राह्मणी के स्नानादि
के लिए आज्ञा दे गई॥५०॥
दासियों द्वारा स्नान नवीन वस्त्र और स्वादिष्ट भोजनों से सम्मानित वह ब्राह्मणी
इस प्रकार आश्वस्त होकर अच्छी सांस लेने लगी जैसे संतृप्त भूमि पानी सींचने पर सोधी सुगन्ध
छोड़ती है ॥५१॥