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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक ४५
यौगन्धरायण वत्सराज के सम्मुख यह कथा कहकर राजा से फिर बोला—
'हे राजेन्द्र ! जीतकर भी उसकी कल्याण-कामना करते हुए तुम्हारा यदि ब्रह्मदत्त (काशिराज)
अपकार करता है, तो तुम उसे दंड दे सकते हो' ॥२१८-२१९॥
मुख्य मन्त्री से इस प्रकार कहे गये राजा ने उसकी सम्मति का अभिनन्दन किया और उठकर
प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त होने में लग गया ॥२२० ॥
और दूसरे दिन वह नीतिकुशल राजा उदयन समस्त दिशाओं को जीतकर लावाणक से
अपनी नगरी कौशाम्बी को चला ॥२२१॥
वत्सराज सभी साधनों के साथ क्रमशः चलकर अपनी नगरी पहुँचा। जो (नगरी)
पताकारूपी भुजलता को ऊपर उठाकर आनन्द से नाचती-सी मालूम हो रही थी ॥२२२॥
नागरिकों की कमल-कानन जैसी आँखों को पग-पग पर हवा के झोकों के समान झकोरता
हुआ (वत्सराज) ने नगरी में प्रवेश किया ॥२२३॥
चरणों से प्रलंबित बन्दियों से अभिनन्दित और राजाओं से प्रणाम किया जाता हुआ
राजा अपने भवन में गया ॥२२४॥
तब सभी देशों के विजित राजाओं को अपने शासन में लाकर परम्परा के अनुसार पूवार्जित
सिंहासन पर साधिकार बैठा ॥२२५॥
उस समय मांगलिक वाद्यों के धीर-गम्भीर शब्दों से आकाश इस प्रकार गूँज उठा मानो
राजा के मुख्य मन्त्रियों द्वारा परितोषित लोकपालों ने प्रत्येक दिशा से एक साथ साधुवाद दिये
हों ॥२२६॥
इसके बाद तेजस्वी राजा ने दिग्विजय के क्रम में अर्जित विपुल धन ब्राह्मणों को दिया
और महोत्सव मनाकर सभी नरेशों तथा अपने मन्त्रियों को कृतार्थ किया ॥२२७॥
इस प्रकार वह राजा जब अपने गुणों के अनुसार पात्रों में दान कर रहे थे तब बजते हुए
मृदंग की मेघ-मन्द्र ध्वनि से प्रतिध्वनित उस नगरी की प्रजा भी अनेक प्रकार के धन-धान्य की
संभावना करती हुई अपने घरों में उत्सव मनाने लगी ॥२२८॥