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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 444

तृतीय लम्बक ४०१
'ऐसा ही होगा' कहकर फलभूति जैसे ही बाहर निकला वैसे ही चन्द्रप्रभ नाम का राज-
पुत्र (राजकुमार) आकर उससे बोला कि यह सोना लो और इस सोने से मेरे लिए वैसे ही कानों
के कुंडल शीघ्र बनवाकर लाओ जैसे तुमने पिताजी के लिए बनवाये थे ॥२ ५४॥
राजकुमार की आज्ञा से फलभूति सोना लेकर तुरन्त कुंडल बनवाने के लिए चला गया।
उधर फलभूति का सन्देश लेकर अकेला ही राजकुमार रसोईघर में साहसिक रसोइये के
समीप गया ॥२ ५५॥
रसोईघर में राजा की आज्ञा से रसोइया पहले से ही तैयार बैठा था। उसने छुरी से राज-
कुमार का वध कर डाला ॥२ ५७॥
उसके मांस से पकाये हुए भोजन को राजा और रानी ने पूजन करने के अनन्तर
खाया क्योंकि वे सच्ची बात नहीं जानते थे कि फलभूति के स्थान पर अपने ही पुत्र का मांस खा
रहे हैं ॥२ ५८॥
पश्चात्ताप से पीड़ित राजा ने किसी प्रकार रात बिताकर प्रातः काल हाथ में कुंडल लेकर
आये हुए फलभूति को देखा ॥२ ५९॥
घबराये हुए राजा ने कुंडल के बहाने उससे समाचार पूछा। उसके द्वारा सारा समाचार
सुनाने पर राजा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा फिर होश में आकर अपने साथ रानी को
कोसता हुआ 'हाय बेटा!'—'हाय बेटा!' इस प्रकार विलाप लगा। मन्त्रियों के पूछने पर
उसने सारा सच्चा समाचार सुना दिया ॥२६०-२६१॥
फलभूति का वह वचन भी बोला जिसे वह प्रतिदिन कहा करता था कि 'भला करनेवाले
का भला होता है और बुरा करनेवाले का बुरा ही होता है' ॥२६२॥
जैसे सामने दीवार पर फेंका हुआ गेंद लौटकर फेंकनेवाले पर आकर गिरता है उसी
प्रकार दूसरे का बुरा चाहनेवाले का अपना बुरा होता है ॥२६३॥
हम पापियों ने ब्रह्महत्या करनी चाही थी उसी के फलस्वरूप अपने ही पुत्र का मांस खाना
पड़ा ॥२६४॥
ऐसा कहकर और शोक एवं आश्चर्य से नीचे मुंह लटकाये हुए मन्त्रियों को समझाकर और
अपने राज्य पर उसी फलभूति को बैठाकर तथा शाप देकर अमुक राजा अपने पापों का प्रायश्चित्त
करने के लिए रानी के साथ आग में जल मरा यद्यपि पश्चात्ताप की आग में वह पहले ही जल
चुका था ॥२६५ २६६॥
इधर फलभूति राज्य पाकर देश का पालन करने लगा। ठीक है अच्छा या बुरा जो कुछ
भी किया जाता है वह अपने ऊपर ही घटित होता है ॥२६७॥