Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 438 of 876

Read in context
Page 438

तृतीय लम्बक १९७
यह सुनकर उसके पति ने क्रोध से जाकर उसके वंश की घोषणा की और सत्र में
उसका भोजन बन्द करा दिया॥१५७॥
गोबाट में सीखे हुए उड़ने के मन्त्र को जानता हुआ सुन्दरक उस नगर को छोड़कर जाने
को उद्यत हुआ किन्तु उतरने का मन्त्र नही जानता था जो सुनने पर भी भूल गया था। उसे पुनः
सीखने के लिए वह फिर उसी सूने गौ-बाड़े में गया ॥१५८-१५९॥
जब वह उस बाड़े में छिपकर बैठा था तब पहले के समान कालरात्रि वहां आई और
मकान-सहित उड़कर उज्जैन गई॥१६०॥
वहां पर मन्त्र के प्रभाव से बाड़े के गोबाट को उतारकर रात कामृत्य करने के लिए फिर
शमशान में गई॥१६१॥
सुन्दरक ने आकाश से उतरने का मन्त्र सुनकर भी याद नहीं किया गुरु के उपदेश के
बिना मन्त्र-सिद्धि कैसे पूरी हो सकती है॥१६२॥
वहां पर उसने पहले के समान मूलियां खाई और कुछ ले जाने के लिए वहीं रख ली
और पहले के समान छिप गया॥१६३॥
तदनन्तर कालरात्रि उस गोबाट-रूपी वाहन पर चढ़कर अपने नगर में आई और
बाहन को वैसे ही रखकर अपने घर चली गई॥१६४॥
वह सुन्दरक भी सबेरे गोबाट से निकलकर मूलियों को बेचकर भोजन का दाम प्राप्त
करने के लिए बाजार में गया॥१६५॥
जब वह मूली बेच ही रहा था तब मालवा की मूलियां बताकर मालवा के सिपाहियों ने
अपने देश की बताकर उससे मूलियां छीन लीं॥१६६॥
उनसे झगड़ते हुए सुन्दरक को उसके मित्रों के साथ सिपाही उसे राजा के समीप
ले गये ॥१६७॥
उन दुष्ट सिपाहियों ने राजा से कहा—'हमलोग उससे पूछते हैं कि तुम मालवा से मूली
लाकर वत्रीश में कैसे बेचते हो? हमारे पूछने पर वह उत्तर नहीं देता उल्टे डेंगों और कचहरी
से मारता है। तब राजा ने भी उससे उस आश्चर्य के सम्बन्ध में पूछा। तब सुन्दरक के मित्र
बोले—'महाराज ! यदि इसको हमलोगों के साथ राजमहल पर चढ़ा दिया जाय तो वह सब
आश्चर्य-वृत्तान्त सुना देगा॥१६८-१७०॥
स्वीकार करके राजा ने उसे छत पर चढ़ा दिया और वह सुन्दरक राजा के देखते-
देखते मन्त्र के प्रभाव से राजभवन-समेत आकाश में उड़ गया॥१७१॥