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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक १९५
वहाँ (उज्जैन में) मन्त्र से उसने उस मकान को एक ग्राम के बाड़े में उतारा और वहाँ
से श्मशान में जाकर डाइनियों के साथ क्रीड़ा करने लगी ॥१४२॥
उसी समय भूख लगने पर सागवाड़े में उतर कर सुन्दरक ने वहाँ से उखाड़ी हुई
मूलियों से भूख शान्त की ॥१४३॥
भूख मिटाकर सुन्दरक फिर पहले के समान गोबाट में जाकर बैठ गया। कालरात्रि
भी रात को आई और पहले के समान शिष्याओं के साथ मन्त्र-सिद्धि के बल से गोबाट को उड़ाकर
अपने घर आ गई ॥१४४ १४५॥
गोबाट को पुनः अपने स्थान पर रखकर शिष्याओं को भेजकर वह अपने शयनागार में
चली गई ॥१४६॥
विघ्नों से चकित सुन्दरक ने वह रात किसी प्रकार बिताई। प्रातः काल गोबाट को
छोड़ कर अपने मित्रों के समीप गया। उनसे अपना वृत्तान्त सुनाकर वह विदेश जाने के लिए
तैयार हुआ किन्तु मित्रों के समझाने-बुझाने से उसने वहीं रहना स्वीकार किया ॥१४७-१४८॥
गुरु-गृह को छोड़कर वह मठ (सभामठ) में भोजन करने लगा और मित्रों के साथ
स्वतन्त्रतापूर्वक विहार करने लगा ॥१४९॥
एक बार वह कालरात्रि घर का सामान खरीदने के लिए निकली और उसने बाजार में
सुन्दरक को देखा और निकट जाकर कहा—'हे सुन्दरक ! काम से पीड़ित मुझे अब भी स्वीकार
कर लो मेरा जीवन सदा के लिए तुम्हारे अधीन है' ॥१५०-१५१॥
उसके ऐसा कहने पर वह सज्जन सुन्दरक बोला—'माता ऐसा न कहो। गुरुपत्नी का
गमन करना धर्म नहीं है। तुम मेरी माता और गुरुपत्नी हो' ॥१५२॥
कालरात्रि फिर बोली—'यदि तुम धर्म पर ध्यान देते हो तो मेरे प्राणों की रक्षा करना
भी महान् धर्म है ॥१५३॥
तब सुन्दरक बोला—'माता हृदय में ऐसी बात न लाओ। गुरुपत्नी का गमन करना
कहाँ का धर्म है ? ॥१५४॥
इस प्रकार उससे तिरस्कृत कालरात्रि उस कामाग्नी हुई अपने हाथ से अपनी चादर
फाड़कर घर चली गई और पति से बोली—'देखो सुन्दरक ने मेरी यह दशा की है ॥१५५ १५६॥