कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextप्रथम लम्बक ११
शिवजी ने समाधि द्वारा वस्तुस्थिति को समझकर पार्वती से कहा— 'जब मैं तुम्हें कथा
सुना रहा था उस समय पुष्पदन्त ने योग द्वारा अलक्षित रूप से अन्दर जाकर उसे सुना था
अन्यथा जया कैसे जानती ? ॥५५॥
पुष्पदन्त और माल्यवान् को पार्वती का शाप
प्रिये ! उसी पुष्पदन्त ने सारी कथा अपनी पत्नी जया को सुना दी। अन्यथा इस कथा
को कौन जानता है। यह सुनकर पार्वती ने अत्यन्त क्रोध के साथ पुष्पदन्त को बुलवाया ॥५६॥
व्याकुल हुए पुष्पदन्त को तथा उसे क्षमा करने की प्रार्थना करते हुए माल्यवान् नामक
गण को पार्वती ने शाप दिया कि तुम लोग मनुष्य-योनि में उत्पन्न हो ५७।
शापान्त की घोषणा
जब वे दोनों गण जया के साथ पार्वती के चरणों में गिरकर, क्षमा प्रार्थना करने लगे
तब पार्वती ने शाप के अन्त की घोषणा करते हुए कहा—॥५८॥
सुप्रतीक नाम का यक्ष कुबेर के शाप से विन्ध्यारण्य में पिशाच बनकर रहता है जो
काणभूति के नाम से प्रसिद्ध है ॥५९॥
हे पुष्पदन्त जब तुम उस काणभूति को देखकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करोगे
और यह कथा उसे सुनाओगे तब शाप से मुक्त हो जाओगे ॥६०॥
यह माल्यवान् जब काणभूति से इस कथा को सुनकर प्रसारित करेगा तब काणभूति
के मुक्त होने पर यह भी मुक्त हो जायेगा' ॥६१॥
ऐसा कहकर नग-नन्दिनी पार्वती चुप हो गई और वे दोनों गण उसी क्षण देखते-देखते
ही अन्तर्धान हो गए ॥६२॥
तदनन्तर कुछ समय बीतने पर पार्वती ने करुणायुक्त होकर शिव से पूछा कि—'देव !
मुझसे शापित वे दोनों गण कहाँ उत्पन्न हुए ? ॥६३॥
तब चन्द्रशेखर शिव ने कहा— 'प्रिये ! कौशाम्बी नाम की जो महानगरी है उसमें
पुष्पदन्त वररुचि के नाम से उत्पन्न हुआ है ॥६४॥
और वह माल्यवान् गण भी सुप्रतिष्ठित नाम के नगर में गुणाढ्य नाम से उत्पन्न
हुआ है—यही उन दोनों का वृत्तान्त है' ॥६५॥
मघवान् शिव इस प्रकार कहकर, निरन्तर सेवा-निरत सेवकों के अपमान से सन्तप्त पार्वती
का मनोविनोद करते हुए, कैलास-तट पर बने हुए कल्प-लता के कुंज-गृहों में निवास करने लगे ॥६६॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर का कथापीठ लम्बर नामक
प्रथम तरंग समाप्त।
१ पांडव वंश के राजाओं ने हस्तिनापुर को छोड़कर 'कौशाम्बी' को अपनी राजधानी
बनाया था। उस नगरी की स्थिति के सम्बन्ध में ऐतिहासिकों में मतभेद है। किन्तु आजकल यह
सिद्धान्त प्रायः स्थिर है कि प्रयाग से दक्षिण १४ मील की दूरी पर स्थित 'कोसम' गांव ही प्राचीन
कौशाम्बी है। यहाँ एक वृहत् नगर के अनेक ध्वंसावशेष मिले हैं। महात्मा बुद्ध ने भी यहाँ निवास किया
था। पुरातत्त्व-विभाग द्वारा खुदाई करने पर प्राचीन नगरी के तथा बौद्ध-सम्बन्धी अवशेष प्राप्त हुए हैं।