कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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उनमें ज्येष्ठ पुत्र सोमदत्त सुन्दर होने पर भी मूर्ख और उद्दण्ड था तथा छोटा पुत्र
विद्वान् विनयी और अध्ययनप्रेमी था। दोनों विवाहित थे अतः पिता की मृत्यु हो जाने
पर दोनों ने गाँव का आधा-आधा बाँट लिया ।।९-१० ।।
दोनों में छोटा वैश्वानरदत्त विद्वान् होने के कारण राजा से सम्मानित था और बड़ा
सोमदत्त उद्दण्ड एवं क्षत्रिय कर्म (लड़ने-भिड़ने) करनेवाला था ।।११।।
एक बार मूर्ख द्यूतों के साथ गोष्ठी बनाकर बैठे हुए सोमदत्त को उसके पिता के किसी मित्र
ने कहा हे मूर्ख ! अग्निदत्त के पुत्र होकर द्यूतों का-सा व्यवहार करते हो। राजा से सम्मानित
अपने छोटे भाई को देखकर लज्जित नहीं होते ।।१२-१३।।
यह सुनकर क्रुद्ध सोमदत्त ने दौड़कर उस ब्राह्मण को लात मारी ।।१४।।
लात खाकर उस ब्राह्मण ने वहाँ बैठे हुए लोगों को गवाह बनाकर राजा के समीप
आकर निवेदन किया ।।१५।।
तब राजा ने सोमदत्त को बाँधकर लाने के लिए सिपाहियों को भेजा। सोमदत्त के
मूर्ख मित्रों ने शस्त्रा से उन सिपाहियों को मारा ।।१६।।
यह सुनकर क्रोध में राजा ने सेना के द्वारा पकड़वाकर उसे फाँसी की आज्ञा दे दी ।।१७।।
सूली पर चढ़ा हुआ वह ब्राह्मण मानो किसी के द्वारा फेंका हुआ-सा पृथ्वी पर गिर
पड़ा ।।१८।।
भाग्य ही भविष्य में होनेवाले कल्याण की रक्षा करते हैं। उस फिर सूली पर चढ़ाने
के लिए तैयार बधिक अन्धे हो गये। उसी समय उसके छोटे भाई के अनुनय-विनय करने पर
राजा ने उसे फाँसी से छुड़ा दिया ।।१ ९ -२० ।।
मृत्यु-मुख से छूटे हुए सोमदत्त ने राजा के द्वारा किये गये अपमान के कारण अपनी गृहस्थी
के साथ उस देश को छोड़कर दूसरे देश जाने की इच्छा प्रकट की ।।२१।।
जब उसके एकत्र हुए बन्धुओं ने उसे देश-त्याग के लिए मना किया तब उसने राजा के
आधे ग्राम का अधिकार छोड़ दिया और वहीं रहने लगा ।।२२।।
ग्राम छूट जाने न जीवन-निर्वाह का उपाय न देखकर उसने कृषि (खेती) करने का निश्चय
किया और कृषि-योग्य भूमि ढूँढ़ने के लिए किसी शुभ दिन जङ्गल में गया ।।२३।।
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