कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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मेरा पति यद्यपि दरिद्र है फिर भी मैंने उससे नहीं कहा। वह जुआरी है इसलिए
मेरा शत्रु है और तुम मेरे परम प्रिय हो। इसलिए तुमसे कह रही हूँ॥३६॥
अतः तुम जाकर और धन देकर मेरे पति से उसका मकान खरीद लो और उस धन
को निकालकर यहाँ आकर मेरे साथ सुख से रहो॥३७॥
उस कुटिला स्त्री से इस प्रकार कहा गया उसका जार (यार) बिना परिश्रम धन-प्राप्ति
की आशा से प्रसन्न हो गया॥३८॥
देवदास ने भी उस दुष्टा स्त्री के वाक्य-जाल में बद्ध होकर धन के भाग को हड़प
में गाड़ दिया॥३९॥
इस प्रकार उस बनिये की पत्नी का गुप्त पति वह बनिया गङ्गा के माध्यम से व्यापार
के बहाने पाटलिपुत्र को चला॥४०॥
उसने पटना जाकर देवदास से उस घर को खरीद लिया। देवदास ने भी जान-बूझकर
अधिक मूल्य में मकान उसे दे दिया। देवदास भी पाटलिपुत्र में आकर अपने विश्राम के लिए
नये घर का प्रबन्ध करके श्वशुर-गृह से शीघ्र ही अपनी स्त्री को लिवा लाया॥४१-४२॥
ऐसा होने पर उसकी पत्नी का गुप्त कामी वह धूर्त बनिया उस मकान में खजाना न
पाकर देवदास से आकर बोला॥४३॥
'यह तुम्हारा पुराना मकान मुझे अच्छा नहीं लगा इसलिए मेरा दाम लौटा दो और
अपना घर ले लो'॥४४॥
वह बनिया इस प्रकार कह रहा था और देवदास इन्कार कर रहा था। इस प्रकार
लड़ते-झगड़ते वे दोनों फैसला कराने के लिए राजा के सम्मुख जा पहुँचे॥४५-४६॥
राजा के पास जाकर हार्दिक दुःख से सन्तप्त देवदास ने अपनी दुष्ट पत्नी का समस्त वृत्तान्त
राजा से कहा॥४७॥
तब राजा ने पुरोहित आदि का सत्कारकर अपनी पत्नी के जन्म की खोज की और दुरात्मा
भवन के राज्य में उस श्रेष्ठ (कण्ठकी) का भी सर्वस्व हरण कर दण्ड दिया॥४८॥
दृष्टान्त उद्धृत कर स्त्री की दुष्टता सिद्ध करने भी पद्मावती
भ्रष्टाह से वह ...