कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतदनन्तर राजा रानियां और मन्त्रियों के साथ तीन रात तक उपवास करते हुए राजा को
शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया ॥६॥
'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ लगे तुम बिना किसी विघ्न-बाधा के विजय प्राप्त करोगे' ॥७॥
शिवजी के प्रसाद से कष्ट रहित राजा इस प्रकार उद्यत हुआ जिस प्रकार सूर्य की किरणों
से वृद्धि प्राप्त करके प्रतिपदा का चन्द्रमा शोभित होता है ॥८॥
प्रभातकाल में उठकर राजा ने मन्त्रियो तथा व्रत-उपवास से क्लान्त फूल के समान कोमल
दोनों पत्नियों को स्वप्न का वर्णन करके हर्षित कर दिया ॥९॥
कानों द्वारा पीने (सुनने) के योग्य उस स्वप्न के कथन से दोनों महारानियों को मानों
मीठी औषधि का उपचार हुआ ॥१०॥
राजा वत्सराज ने तपस्या के प्रभाव से अपने पूर्वजा के समान प्रभाव प्राप्त किया।
और, उसकी दोनों पत्नियों ने पतिव्रताता की पवित्र कीर्ति प्राप्त की ॥११॥
व्रत की समाप्ति के उत्सव पर समस्त नगरवासी उत्सव में व्यग्र रहे। उसके दूसरे दिन
यौगन्धरायण ने राजा को कहा ॥१२॥
स्वामी ! तुम धन्य हो जिस पर शिवजी इस प्रकार प्रसन्न हैं। इसलिए तुम अब
शत्रुओ को जीतकर अपनी भुजा से अर्जित लक्ष्मी प्राप्त करो ॥१३॥
अपन धर्म से प्राप्त सम्पत्ति का विनाश नहीं होता ॥१४॥
इसीलिए तुमने अपने पूर्वजों की चिरकाल से भूमि में गड़ी हुई नष्ट लक्ष्मी को प्राप्त
किया है। इस पर एक कथा सुनो ॥१५॥
देवदास वैश्य की कथा
पाटलिपुत्र नगर में बड़े धनी कुल में उत्पन्न देवदास नामका वैश्य-पुत्र था ॥१६॥
उसकी पत्नी पौण्ड्रवर्धन नगर के किसी धनी वैश्य की कन्या थी ॥१७॥
पिता के मर जाने पर व्यसनी देवदास ने जुए में सारा धन गँवा दिया ॥१८॥
उसके दरिद्र हो जाने पर उसकी पत्नी दुःख से कष्ट में रहती थी। इसलिए उसका
धनी पिता आकर उसे अपने घर (पौण्ड्रवर्धन) ले गया ॥१९॥