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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक ९
कामदहन के उपरान्त धैर्यशालिनी तुमने कठोर तप करके मुझे खरीद किया और
तुम्हारी प्राप्ति के लिए ही मैंने उसे सहन किया ।।४२।।
इस प्रकार पूर्व जन्म में तुम मेरी पत्नी थी। अब और क्या कहूँ?” इतना कहकर
शिवजी के चुप हो जाने पर क्रुद्ध पार्वती बोली ।।४३।।
पार्वती का प्रथम-कोप
तुम धूर्त हो मेरी प्रार्थना पर भी मनोहर कथा नहीं सुना रहे हो। तुम एक
ओर गंगा को धारण किये हो और दूसरी ओर सन्ध्या का नमस्कार करते हो यह मैं
जानती हूँ ।।४४।।
पार्वती के व्यंग्य वचन सुनकर शिवजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और दिव्य कथा
सुनाने का वचन दिया। इससे पार्वती प्रसन्न हुई ।।४५।।
शिवजी को उद्यत देखकर पार्वती ने स्वयं आज्ञा दी कि यहाँ कोई न आवे। आज्ञानुसार
नन्दी के द्वारा प्रवेश बन्द कर देने पर शिवजी ने कथा कहना प्रारम्भ किया ।।४६।।
गुप्त कथा का उपक्रम
शिवजी कहने लगे— हे देवि देवता सदा सुखी रहते हैं और मनुष्य नित्य दुःखित
रहते हैं। इसलिए उनके चरित्र उत्कृष्ट रूप से मनोहर नहीं होते। अतः मैं दिव्य और मानुष
दोनों प्रकृतियों से मिश्रित विद्याधरों का चरित्र तुम्हें सुनाता हूँ। शिवजी यह कह ही रहे थे
कि उसी समय उनका एक परम कृपापात्र उनका मनोरंजन करनेवाला गण पुष्पदन्त आ
गया और द्वार पर बैठे हुए नन्दी ने उसे रोका ।।४७ ४८ ४९ ।।
'बिना कारण ही मेरे ऐसे अन्तरंग व्यक्ति का भी निषेध किया जा रहा है' इस
कौतूहल के कारण पुष्पदन्त योगशक्ति द्वारा तुरन्त अन्दर पहुँच गया ।।५० ।।
उसने अन्दर प्रवेश कर शिवजी द्वारा वर्णन किये जाते हुए सात विद्याधरों के अपूर्व
और अद्भुत चरित्र सुने ।।५१।।
पुष्पदन्त ने, शिवजी के मुख से सुनकर सात विद्याधरों के उस अद्भुत चरित्रों
को जाकर अपनी पत्नी जया को सुनाया ।।५२।।
पुष्पदन्त की पत्नी तथा पार्वती की सखी जया ने पति (पुष्पदन्त) से सुने हुए सात
विद्याधरों के चरित्र को पार्वती को जा सुनाया। भला स्त्रियों में वाणी का संयम कहाँ
सम्भव है ! ।।५३।।
जया से यह कथा सुनकर पार्वती ने क्रोधपूर्वक शिवजी से कहा— तुमने कोई अपूर्व
कथा मुझे नहीं सुनाई, इस कथा को तो जया भी जानती है' ।।५४।।
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