कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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आधा राज्य प्राप्त करके वह विदूषक उसी क्षण राजा बन गया। उसके मस्तक पर ऊँचा
छत्र रच गया और चारों ओर चँवर डुलने लगे॥४३॥
मांगलिक बाजों के शब्द से भरी हुई नगरी ऐसी मालूम हो रही थी मानो हर्ष के कारण
प्रसन्नता प्रकट कर रही हो॥४४॥
इस प्रकार राज्य-वैभव प्राप्त करके विदूषक धीरे-धीरे सारी पृथ्वी को विजय करके
स्नेह से एक साथ रहती हुई भद्रा आदि पत्नियों के साथ चिरकाल तक आनन्द का अनुभव करता
रहा॥४५॥
इस प्रकार, दैव के अनुकूल होने पर मनुष्य का अपना ही बल और साहस लक्ष्मी को हठ
पूर्वक आकृष्ट करने का महामन्त्र हो जाता है॥४६॥
आश्चर्यमयी इस कथा को वत्सराज के मुंह से सुनकर वे सभी यौगन्धरायण आदि मन्त्री
तथा दोनों महाराणियां (वासवदत्ता पद्मावती) अत्यन्त प्रसन्न हुईं ॥४७॥
चतुर्थ तरङ्ग समाप्त
पंचम तरंग
वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना
तब यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा—'महाराज ! इस समय आपका दैव (भाग्य)
अनुकूल है और पुरुषार्थ (बल) तुममें है ही। इधर हमलोग (मन्त्रिगण) भी राजनीतिक दाँव-
पेंचों के जानकार हैं इसलिए जैसा सोचा गया है तदनुसार पृथ्वी का विजय करो'॥१ २॥
यह सुनकर वत्सराज ने कहा—'यह ठीक है, किन्तु कल्याण-साधना में विघ्न बहुत
होते हैं ॥३॥
इसलिए मैं इस विजय की सिद्धि के लिए मैं तप द्वारा शिव जी की आराधना करता हूँ
क्योंकि उनकी कृपा के बिना इष्ट सिद्धि कैसे हो सकती है' ॥४॥
राजा की इस इच्छा का सभी मन्त्रियों ने इस प्रकार अनुमोदन किया जिस प्रकार सेतु
बाँधने के लिए उद्यत रामजी के दिशागमन के लिए सभी वानरों ने अनुमोदन किया था॥५॥