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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक १५५

आकाश-मार्ग से समुद्र में किये गये अपने पौरुष का वर्णन करता हुआ विदूषक क्रमशः
समुद्र पार कर गया ॥३८८॥
इस प्रकार, वह क्रमशः पौण्ड्र-वर्धन नगर में पहुँचा। राक्षस को वाहन बनाये हुए उस
विदूषक को सभी पुरवासी आश्चर्य से देख रहे थे ॥३८९-३९०॥
पौण्ड्रवर्धन नगर में विदूषक ने राक्षस को पराजित की हुई चिरकाल से उत्सुक देवसेन
राजा की कन्या का स्वाभत किया ॥३९१॥
राजा देवसेन द्वारा रोका जाता हुआ भी विदूषक उज्जैन जाने के लिए उत्सुक हो रहा
था अतः वहाँ रुका नही और उसे भी साथ लेकर उज्जैन पहुँचा ॥३९२-३९३॥
विशाल शरीरवाले राक्षस के ऊपर बैठे हुए और कन्धे पर बैठी हुई अपनी वधू की शोभा
से शोभित होते हुए विदूषक को उज्जयनी की जनता ने जलती हुई ओषधियोंवाले पूर्वाचल
के शिखर पर चमकते हुए चन्द्रमा के समान देखा ॥३९४-३९५॥
नागरिकों के आश्चर्यचकित और व्याकुल होने पर समस्त वृन्तान्त जानकर विदूषक
का श्वसुर राजा आदित्यसेन उसके सम्मुख आया ॥३९६॥
तब विदूषक ने राक्षस के कन्धे से शीघ्र ही उतरकर राजा को प्रणाम किया। राजा ने
भी उसका अभिनन्दन किया ॥३९७॥
तदनन्तर विदूषक ने राक्षस के कन्धे पर बैठी हुई सभी पत्नियों को उतारकर उसे
स्वतन्त्रता-पूर्वक विचरण करने के लिए छोड़ दिया ॥३९८॥
राक्षस के चले जाने पर विदूषक अपनी पत्नियों को लिये हुए राजा के साथ राजभवन
में गया। राजभवन में जाकर राजा की कन्या और अपनी प्रथम पत्नी से मिला जो चिरकालीन
विरह के कारण अत्यन्त उत्कण्ठित हो रही थी ॥३९९-४००॥
उज्जयिनी-नरेश आदित्यसेन ने विदूषक के प्रभाव को देखकर उसे अपने जामाता का
आधा राज्य प्रदान कर दिया ॥४०१॥
राजा ने विदूषक से पूछा कि ये इतनी पत्नियां कैसे प्राप्त कीं और यह राक्षस कौन है?
विदूषक ने क्रमशः सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥४०२॥