कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 394 of 876
Read in contextतृतीय लम्बक १५३
'तुम्हारे प्रेम के सहारे अनेक प्रकार के प्राण-संशयों को प्राप्त करते हुए आया हूँ और
क्या कहूँ ?' यह सुनकर और प्राणों की परवा न करनेवाले उसके प्रेम को देखकर अत्यन्त स्नेह-
पूर्ण भद्रा उससे बोली—॥१७३। १७४॥
'आर्यपुत्र ! मुझे अपनी सखियों या सिद्धियों से कुछ भी प्रयोजन नहीं। हे स्वामी !
मैं तो तुम्हारे गुणों से खरीदी हुई दासी हूँ' ॥१७५॥
तब विदूषक बोला—'यदि ऐसा है तो मेरे साथ आओ। इस दिव्य भोग को छोड़कर
उज्जयिनी रहने के लिए चलो' ॥१७६॥
भद्रा ने तुरन्त उसकी बात स्वीकार कर ली और इस प्रकार का विचार करने से नष्ट
हुई विद्या को तृण के समान छोड़ दिया ॥१७७॥
भद्रा की सभी योगेश्वरों के समस्त प्रबन्ध करने पर विदूषक ने उस रात को वहीं
विश्राम किया ॥१७८॥
और प्रातःकाल ही भद्रा के साथ उदयाचल से नीचे उतर कर यमदंष्ट्र नामक राक्षस
को विदूषक ने फिर याद किया ॥१७९॥
स्मरण करते ही उपस्थित राक्षस को मार्ग के कायक्रम बताकर और भद्रा को उसके
कन्धे पर चढ़ाकर विदूषक स्वयं भी उस पर सवार हो गया ॥१८०॥
उस अति कोमल भद्रा ने भी राक्षस के कठोर कन्धे पर चढ़ने का कष्ट सहन किया।
प्रेम-परार्धीन रमणियां क्या नहीं करतीं ? ॥१८१॥
प्रेयसी के साथ राक्षस पर सवार विदूषक फिर उसी कर्कोटक नगर में पहुँचा ॥१८२॥
राक्षस को देखने के कारण व्याकुल जनता न देखा जाता हुआ विदूषक जरा आर्यवर्मा
के समीप गया और अपनी पत्नी को सौंपा ॥१८३॥
कान-फूसूफ़ से ज्ञात की हुई आर्यवर्मा की लड़की को साथ लेकर उसी प्रकार राक्षस पर
सवार होकर वह वर्द्धमान नगर में चला ॥१८४॥
समुद्र के तट पर पहुँच कर उसने उस पूर्व बनिये को पकड़ा, जिसके छोटे जहाज को
छुड़ाकर लाने से उसकी कन्या को जीत लिया था और जिसने पहले रानी बनकर उस नगर में
रहने के लिए छोड़ दिया था ॥१८५॥
विदूषक ने उसको सब बात बतलाकर विदा किया। सजनता को ही उसने बीज के रूप
में उगा हुआ, क्योंकि यश ही मनुष्य का दूसरा जन्म होता है ॥१८६॥
इस प्रकार बनिये की बेटी को लेकर उसी राक्षस-रूपी रथ पर बैठा हुआ विदूषक उठा
और राजकुमारी के रम्य आवास के तट गया ॥१८७॥
४५